Sajjan Kumar Death : 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामलों में उम्रकैद की सजा भुगत रहे पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार का निधन हो गया है. 80 वर्षीय सज्जन कुमार को स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया था, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. अस्पताल प्रबंधन की ओर से उनकी मौत की विस्तृत वजहों को लेकर आधिकारिक विवरण आना अभी बाकी है. उनके निधन के साथ ही 1984 के दंगों और उनसे जुड़े न्यायिक फैसलों का अध्याय एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है.
दिल्ली कैंट दंगा मामले में मिली थी आजीवन कारावास की सजा
नवंबर 1984 के दंगों के दौरान दिल्ली कैंट स्थित पालम कॉलोनी में पांच लोगों की हत्या और गुरुद्वारे में आगजनी के मामले में सज्जन कुमार को मुख्य आरोपियों में शामिल किया गया था. इस केस में दिल्ली हाई कोर्ट ने 17 दिसंबर 2018 को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उन्हें ताउम्र कैद की सजा दी थी. इस अदालती फैसले के तुरंत बाद उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था और उनका राजनीतिक करियर हमेशा के लिए थम गया था.
सरस्वती विहार मामले में अदालत ने ठहराया था दोषी
सज्जन कुमार के खिलाफ एक और प्रमुख मामला 1 नवंबर 1984 को सरस्वती विहार इलाके में सरदार जसवंत सिंह और उनके पुत्र तरुणदीप सिंह की हत्या से जुड़ा हुआ था. अभियोजन पक्ष के अनुसार, बेकाबू भीड़ ने दोनों पीड़ितों पर घातक हथियारों से हमला किया था और बाद में उन्हें जिंदा जला दिया था. लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने 12 फरवरी 2025 को उन्हें इस जघन्य अपराध का दोषी माना था और 25 फरवरी 2025 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी.
सुल्तानपुरी केस में सबूतों के अभाव में हुए थे बरी
सिख विरोधी दंगों से संबंधित एक अन्य मामला सुल्तानपुरी क्षेत्र का था, जिसमें तीन लोगों की जान चली गई थी. इस केस की सुनवाई के दौरान प्रत्यक्षदर्शियों ने उन पर भीड़ को भड़काने के गंभीर आरोप लगाए थे. हालांकि, सितंबर 2023 में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने पर्याप्त और ठोस साक्ष्यों की कमी का हवाला देते हुए उन्हें इस विशिष्ट मामले से बरी कर दिया था.
बाहरी दिल्ली की राजनीति में रहा था कई दशकों तक वर्चस्व
राजनीतिक सफर की बात करें तो 1980 के दशक में सज्जन कुमार की गिनती दिल्ली कांग्रेस के सबसे कद्दावर और प्रभावशाली नेताओं में होती थी. उन्होंने बाहरी दिल्ली और उत्तर-पश्चिम दिल्ली के विशाल वोट बैंक पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई रखी थी. वह 1980, 1991 और 2004 में तीन बार लोकसभा के सदस्य चुने गए. हालांकि, 1984 के दंगों में नाम आने और बाद में अदालतों द्वारा दोषी ठहराए जाने के कारण उनका पूरा सार्वजनिक जीवन कानूनी बहसों और विवादों के साये में ही बीता.