Juvenile Justice Act: किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 को लागू हुए 10 साल पूरे होने पर रविवार को रांची में राज्य स्तरीय सम्मेलन आयोजित किया गया. डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम सभागार, झारखंड न्यायिक अकादमी में हुए इस कार्यक्रम में न्यायपालिका और प्रशासन से जुड़े विशेषज्ञों ने बच्चों के अधिकार और उनके भविष्य को लेकर विचार साझा किए.
सम्मेलन में वक्ताओं ने साफ कहा कि किशोर न्याय कानून का मकसद बच्चों को अपराध के लिए केवल सजा देना नहीं है. कानून की पूरी व्यवस्था इस सोच पर आधारित है कि बच्चों को सही मार्गदर्शन मिले, उनका सुधार हो और उन्हें दोबारा समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके.
मुख्य न्यायाधीश ने किया सम्मेलन का उद्घाटन
कार्यक्रम की शुरुआत झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति महेश शरदचंद्र सोनक और किशोर न्याय-सह-पॉक्सो समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद ने दीप प्रज्वलित कर की. इस मौके पर मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति महेश शरदचंद्र सोनक ने किशोर न्याय अधिनियम को बच्चों के प्रति संवेदनशील और मानवीय सोच पर आधारित व्यवस्था बताया.
उन्होंने कहा कि यह कानून केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि ऐसा मानवीय ढांचा है, जो बच्चों को बेहतर भविष्य देने और एक संवेदनशील समाज तैयार करने की दिशा में काम करता है.
बच्चों को बताया समाज की मजबूत नींव
मुख्य न्यायाधीश ने अपने संबोधन में कवि वर्ड्सवर्थ और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट के विचारों का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि बच्चे किसी भी समाज के भविष्य की सबसे मजबूत नींव होते हैं. उन्होंने जोर दिया कि बच्चों की सुरक्षा, देखभाल और सही दिशा में मार्गदर्शन की जिम्मेदारी किसी एक संस्था की नहीं है. इसके लिए न्यायपालिका, प्रशासन, पुलिस, सामाजिक संस्थाओं और समाज के दूसरे सभी पक्षों को मिलकर काम करना होगा.
न्यायमूर्ति महेश शरदचंद्र सोनक ने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए बच्चों को सुरक्षित और बेहतर वातावरण देना बेहद जरूरी है. उन्होंने कहा कि बच्चों के संरक्षण के साथ-साथ उन्हें शिक्षा, सही मार्गदर्शन और सुधार का अवसर मिलना चाहिए. इसके लिए सभी संबंधित संस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है.
सम्मेलन में इस बात पर भी जोर दिया गया कि किशोरों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता के साथ काम किया जाए, ताकि कानून से सामना करने वाले बच्चों को सुधार और पुनर्वास के जरिए सामान्य जीवन में लौटने का अवसर मिल सके.