Giridih News: पारसनाथ पहाड़ को लेकर धार्मिक और पारंपरिक अधिकारों का विवाद एक बार फिर सामने आया है. जैन समुदाय की ओर से पारसनाथ पहाड़ को लेकर विशेष व्यवस्था की मांग का मारंग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा ने विरोध किया है. मोर्चा का कहना है कि पारसनाथ पहाड़ संथाल आदिवासी समाज के लिए सिर्फ एक पहाड़ी नहीं, बल्कि मारंग बुरू के रूप में प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल है.
सदियों पुरानी परंपरा का दिया हवाला
मोर्चा के अनुसार, संथाल समुदाय लंबे समय से पारसनाथ और आसपास के इलाकों में पारंपरिक तरीके से पूजा-अर्चना करता आ रहा है. संगठन ने दावा किया कि इस पूरे क्षेत्र में आज भी आदिवासी समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था कायम है. मोर्चा के मुताबिक, 24 से अधिक टोलों में माझी यानी पारंपरिक प्रधान की भूमिका महत्वपूर्ण है.
एकतरफा व्यवस्था का विरोध
संगठन ने कहा कि पारसनाथ पहाड़ को लेकर किसी एक समुदाय के पक्ष में एकतरफा व्यवस्था नहीं होनी चाहिए. मोर्चा ने केंद्र और राज्य सरकार से मांग की है कि इस मामले में फैसला लेने से पहले स्थानीय आदिवासी समाज और पारंपरिक नेतृत्व की राय भी सुनी जाए. संगठन ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 का हवाला देते हुए सभी समुदायों की धार्मिक स्वतंत्रता और अधिकारों के समान संरक्षण की बात कही.
“सम्मेद शेखर” नाम पर भी उठे सवाल
मोर्चा ने पारसनाथ पहाड़ के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘सम्मेद शेखर’ नाम को लेकर भी सवाल उठाया है. संगठन का दावा है कि ऐतिहासिक और सरकारी दस्तावेजों में “मारंग बुरू” नाम का उल्लेख मिलता है. मोर्चा ने कहा कि पहाड़ से जुड़े किसी भी धार्मिक या ऐतिहासिक दावे की जांच दस्तावेजों, स्थानीय परंपराओं और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए.
जैन समुदाय पर लगाए आरोप
मोर्चा ने कुछ जैन संगठनों पर धनबल के जरिए सरकार और न्यायालय को प्रभावित करने का आरोप भी लगाया है. हालांकि, ये आरोप मोर्चा की ओर से लगाए गए हैं. संबंधित जैन संगठन या विश्व जैन संगठन का पक्ष इस मामले में सामने आना बाकी है.
आंदोलन की चेतावनी
मारंग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा ने सरकार से पारसनाथ पहाड़ को लेकर किसी भी एकतरफा व्यवस्था की समीक्षा करने की मांग की है. संगठन ने आदिवासी समाज के पारंपरिक और धार्मिक अधिकारों के संरक्षण की मांग भी उठाई है. मोर्चा ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार की ओर से सकारात्मक पहल नहीं हुई, तो आंदोलन को व्यापक स्तर पर ले जाया जाएगा. संगठन का कहना है कि पारसनाथ से जुड़े विवाद का समाधान बातचीत और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, ताकि सभी समुदायों की आस्था और अधिकारों का सम्मान कायम रहे.