Durga Puja 2025: नवरात्रि को शक्ति और साधना का महापर्व कहा जाता है. मां दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना नौ दिनों तक की जाती है. लेकिन क्या आप जानते हैं नवरात्रि व्रत की शुरुआत कब और कैसे हुई? इस सवाल का जवाब शास्त्र और परंपरा दो रूपों में देते हैं. प्राचीन काल से चैत्र नवरात्र का उद्गम जुड़ा हुआ है. वहीं शारदीय नवरात्रि की परंपरा समय के साथ स्थापित हो कर लोकप्रिय हो गई.
दुर्गा पूजा भारत के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है, शक्ति और आरधना का यह पर्व मां के भक्तों के लिए बहुत ही अहम पर्व होता है. नौ दिनों तक मां के भक्त मां के नौ स्वरूपों की पूजा करते है. लेकिन सबसे पहले यह व्रत किसने रखा था? शास्त्रों और परंपराओं में इसका उत्तर दो भागों में मिलता है. एक ओर मार्कंडेय पुराण में कहा जाता है कि नवरात्रि की शुरुआत राजा सूरथ और समाधि वैश्य ने की थी. वहीं रामायण में यह उल्लेख है कि शारदीय नवरात्रि की परंपरा भगवान श्रीराम ने स्थापित की. इन दोनों ही पहलुओं को आइए विस्तार से समझते हैं.
राजा सूरथ और समाधि वैश्य की कथा
मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य यानी दुर्गा सप्तशती में नवरात्रि का विस्तार से वर्णन मिलता है. इसके अनुसार राजा सूरथ और समाधि वैश्य ने नवरात्रि का व्रत रखा. कथा में बताया गया है कि जब राजा सूरथ अपने शत्रुओं से हारकर वंचित हो गए तो वे दुखी होकर वन चले गए. वन में उनकी मुलाकात समाधि नामक व्यापारी से हुई, समाधि को भी उसके परिवार ने त्याग दिया था. राजा सूरथ और समाधि, दोनों ही गहरी पीड़ा में थे और उत्तर खोजते-खोजते मेडा ऋषि के आश्रम पहुंचे. मुनि से राजा और व्यापारी ने अपने दुखों का समाधान पूछा, तब मुनि ने बताया कि संसार की सारी शक्ति आदिशक्ति दुर्गा के अधीन हैं. यदि वे मां की उपासना नवरात्र के नौ दिनों तक करें तो उनकी मनोकामनाएं पूरी हो जाएगी. इसके बाद राजा सूरथ और समाधि ने पुरे नियम से नौ दिनों तक उपवास और पूजा की. उपासना से मां दुर्गा प्रसन्न हुई और राजा को अगले जन्म में साम्राज्य और व्यापारी को मोक्ष का वरदान दिया. इसी वजह से कहा जाता है कि राजा सूरथ और समाधि वैश्य ने नवरात्रि व्रत का प्रथम पालन किया था.
भगवान श्रीराम और शारदीय नवरात्र
रामायण के साथ साथ लोककथाओं में उल्लेख है कि जब भगवान राम रावण से युद्ध की तैयारी कर रहे थे, उस समय उन्होंने कामना से मां दुर्गा की पूजा का संकल्प लिया. ऐसा उल्लेख है कि समस्या यह थी कि उस समय शरद ऋतु चल रही थी. वहीं नवरात्रि पारंपरिक रूप से चैत्र मास में आता था. इसके बाद भगवान श्रीराम ने शास्त्रों से हटकर मां दुर्गा की पूजा आरंभ की. बताया जाता है कि इसे ही अकाल बोधन कहा गया, जिसका मतलब समय से अलग काल में देवी का आवाहान होता है. भगवान राम को मां दुर्गा ने विजय का आशीर्वाद दिया, जिसके बाद ही रावण वध संभव हुआ. कहा जाता है कि इस घटना के बाद ही शारदीय नवरात्रि की परंपरा शुरू हुई और समय के साथ बहुत लोकप्रिय बन गई.
शारदीय और चैत्र नवरात्र का महत्व
शारदीय नवरात्रि: यह भगवान राम के द्वारा की गई मां दुर्गा की पूजा और विजय की कथा से जुड़ा है. इसे आश्विन मास में देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है. यह नवरात्रि मां की कृपा, शक्ति और विजय के प्रतिक का रूप माना जाता है.
चैत्र नवरात्रि: चैत्र नवरात्रि का मूल उद्गम राजा सूरथ और वैश्य से जुड़ा हुआ है. इसे नए साल के आरंभ और वसंत ऋतु की शुरुआत में हिंदू पंचांग के अनुसार मनाया जाता है. इसे साधना और आत्मशुद्धि का पर्व माना जाता है.
दोनों पर्वों की मूल भावना एक ही है, आदिशक्ति मां दुर्गा की उपासना. फर्क सिर्फ इतना है कि समय के साथ इनके स्वरूप और महत्व अलग-अलग रूपों में प्रतिष्ठित हो गए. नवरात्रि की उत्पत्ति चैत्र मास से मानी जाती है, लेकिन धीरे-धीरे शारदीय नवरात्रि सबसे प्रमुख और लोकप्रिय परंपरा बन गई. यही कारण है कि आज इसे शक्ति साधना, विजय और आस्था के महापर्व के रूप में व्यापक रूप से मनाया जाता है.
शास्त्रों के अनुसार नवरात्रि व्रत की प्राचीन परंपरा राजा सूरथ और समाधि वैश्य से जुड़ी मानी जाती है, जबकि शारदीय नवरात्रि की शुरुआत भगवान श्रीराम ने की थी. मान्यता है कि रावण पर विजय प्राप्त करने से पहले श्रीराम ने मां दुर्गा की आराधना की थी. इसी वजह से शारदीय नवरात्रि आज विजय, शक्ति और आस्था का सबसे महत्वपूर्ण पर्व मानी जाती है.