Bihar Elections 2025: बिहार विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है. इस बार का चुनाव पिछले हर चुनाव से कहीं ज्यादा दिलचस्प और टक्कर वाला माना जा रहा है. एक ओर एनडीए है, जिसमें बीजेपी, जेडीयू, चिराग पासवान की पार्टी और जीतन राम मांझी जैसे सहयोगी दल शामिल हैं, तो दूसरी तरफ महागठबंधन खड़ा है, जिसमें तेजस्वी यादव की अगुवाई में राजद, कांग्रेस और मुकेश सहनी की वीआईपी पार्टी बेरोजगारी और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों को लेकर मैदान में उतर रही है. इस बार मुकाबला सिर्फ दो गठबंधनों का नहीं बल्कि दो राजनीतिक शख्सियतों का है. एक तरफ हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और दूसरी तरफ हैं युवा नेता तेजस्वी यादव. दोनों के सामने अपने-अपने अवसर, चुनौतियां और जोखिम हैं.
नीतीश कुमार की स्थिति
नीतीश कुमार की सबसे बड़ी ताकत उनकी वर्षों की प्रशासनिक साख और जमीन से जुड़ी छवि है. सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के बावजूद उन्होंने एक सुलझे हुए और अनुभवी नेता के रूप में अपनी पहचान कायम रखी है. बिहार का एक तबका आज भी उन्हें “सुशासन बाबू” के नाम से जानता है और यह छवि उनके लिए चुनाव में सबसे बड़ा पूंजी साबित हो सकती है.
हालांकि नीतीश कुमार के सामने कई मुश्किलें भी हैं. पिछली विधानसभा में उन्हें केवल 43 सीटों से संतोष करना पड़ा था और इस बार सत्ता विरोधी लहर उनके लिए सिरदर्द बन सकती है. उम्र का बढ़ना और युवाओं के बीच घटती पकड़ भी विपक्ष के लिए हमला करने का आसान हथियार है. लेकिन उनके पास अभी भी बड़ा मौका है, अगर वे इस चुनाव में फिर जीत दर्ज करते हैं तो वह दसवीं बार मुख्यमंत्री बनेंगे. केंद्र की बीजेपी सरकार का समर्थन उनके लिए एक मजबूत सहारा है. विकास योजनाओं के जरिए वे जनता को भरोसे में ले सकते हैं.
फिर भी उनके लिए सबसे बड़ा खतरा बीजेपी का बिहार में तेजी से बढ़ता प्रभाव है. पिछले चुनाव में बीजेपी ने 74 सीटें जीतकर संकेत दे दिया था कि वह अब जूनियर पार्टनर नहीं रहना चाहती. जानकार मानते हैं कि अगर बीजेपी ने इस बार नीतीश के मुकाबले खुद को अधिक प्रभावशाली दिखाया तो आगे बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उसकी दावेदारी मजबूत हो जाएगी. इसके अलावा तेजस्वी यादव का युवाओं में बढ़ता प्रभाव भी नीतीश के लिए एक सियासी चुनौती बन चुका है.
तेजस्वी यादव की स्थिति
पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव इस बार अपने सियासी करियर के सबसे निर्णायक मोड़ पर हैं. उनकी सबसे बड़ी ताकत युवाओं में उनकी लोकप्रियता है. बेरोजगारी और शिक्षा जैसे मुद्दों को उन्होंने जातिगत राजनीति के बीच केंद्र में लाकर अपनी अलग पहचान बनाई है. यादव-मुस्लिम वोट बैंक का मजबूती से उनके साथ होना उन्हें हर सीट पर एक बुनियादी समर्थन देता है.
हालांकि तेजस्वी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने परिवार की पुरानी “जंगलराज” वाली छवि से बाहर निकलना है. बिहार की एक बड़ी आबादी अब भी लालू यादव के दौर की कानून व्यवस्था को याद कर राजद पर सवाल उठाती है. ऐसे में तेजस्वी के सामने अपनी छवि को सुधारना और नई पीढ़ी के नेता के रूप में भरोसा कायम करना बड़ी परीक्षा है.
उनके सामने बड़ा अवसर यह है कि 2020 में उन्होंने 75 सीटें जीतकर यह साबित कर दिया था कि बिहार की जनता उन्हें गंभीरता से सुन रही है. अगर इस बार वह अपने गठबंधन को एकजुट रख पाने में सफल रहते हैं और युवाओं के मुद्दों को केंद्र में रखते हैं तो मुख्यमंत्री की कुर्सी उनके करीब आ सकती है. लेकिन संगठनात्मक स्तर पर राजद को अभी और मजबूत होने की जरूरत है. बीजेपी बूथ स्तर पर अपनी पकड़ बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रही है, जबकि राजद का जमीनी नेटवर्क कई जिलों में कमजोर नजर आता है, खासकर जिन सीटों पर भाजपा का कब्जा हैं. यह तेजस्वी के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है.
एनडीए की स्थिति
एनडीए के पास सबसे बड़ी ताकत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा है. बिहार में मोदी की लोकप्रियता आज भी बरकरार है और कई राज्यों की तरह यहां भी उनकी छवि एनडीए के लिए वोटों का ट्रांसफर करा सकती है. “डबल इंजन सरकार” का नारा एक बार फिर मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए चुनावी रैलियों में फूंका जा सकता है, खासकर उन इलाकों में जहां केंद्र की योजनाओं का असर दिख रहा है.
लेकिन एनडीए की सबसे बड़ी कमजोरी उसके भीतर की दरारें हैं. बीजेपी और जेडीयू के बीच सीट बंटवारे और नेतृत्व को लेकर असहमति का असर पिछले चुनाव में दिख चुका है. चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे सहयोगी भी कई बार गठबंधन के लिए असहज बयान देते रहे हैं. स्थानीय मुद्दे जैसे बेरोजगारी, पलायन और अपराध भी एनडीए के लिए मुश्किलें बढ़ा सकते हैं.
एनडीए के लिए इस समय सबसे बड़ा अवसर यह है कि विपक्ष में स्पष्ट एकता की कमी है. अगर बीजेपी-जेडीयू एकजुट होकर चुनाव लड़ते हैं तो यह विपक्षी मतों के बिखराव का फायदा उठा सकते हैं. लेकिन नीतीश के खिलाफ बढ़ती नाराजगी और लंबे शासन के बाद जनता की थकान इस बार उन्हें नुकसान भी पहुंचा सकती है.
महागठबंधन की स्थिति
महागठबंधन की सबसे मजबूत नींव उसका जातीय समीकरण है. मुस्लिम और यादव वोट बैंक के साथ-साथ ओबीसी वर्गों में भी राजद की अच्छी पकड़ है. कांग्रेस और वीआईपी जैसी पार्टियां मिलकर सामाजिक संतुलन बनाने की कोशिश में हैं. महागठबंधन के पास “परिवर्तन” का नैरेटिव है जो बेरोजगारी, शिक्षा और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमता है.
फिर भी इस गठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी उसका आंतरिक तालमेल है. सीट बंटवारे और नेतृत्व के मुद्दे पर कई बार मतभेद सामने आते रहे हैं. कांग्रेस की बढ़ती महत्वाकांक्षा और स्थानीय स्तर पर कमजोर संगठन चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं. महागठबंधन के लिए सबसे बड़ा अवसर नीतीश कुमार के खिलाफ जनता के असंतोष को भुनाने का है. अगर वे बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों को मजबूती से उठा पाते हैं, तो यह चुनाव उनके पक्ष में जा सकता है. लेकिन अगर कांग्रेस या अन्य सहयोगी कमजोर प्रदर्शन करते हैं, तो यह पूरे गठबंधन की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकता है.
बिहार का यह चुनाव इस बार केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं बल्कि दो पीढ़ियों की टक्कर है, एक ओर हैं अनुभवी नीतीश कुमार और दूसरी ओर युवा तेजस्वी यादव. दोनों के लिए यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई है. जहां नीतीश को अपनी साख बचानी है, वहीं तेजस्वी को खुद को साबित करना है. एनडीए के पास संगठन और संसाधनों की ताकत है, तो महागठबंधन के पास जनाक्रोश और परिवर्तन का भाव. कौन इन परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ पाता है, यह आने वाले दिनों में तय होगा. लेकिन इतना तय है कि इस बार बिहार की जनता के सामने विकल्प साफ हैं और मुकाबला बेहद रोमांचक होने वाला है.