NACDAOR Report: बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद दलित और आदिवासी संगठनों के राष्ट्रीय परिसंघ एनएसीडीएओआर ने “बिहार - दलित क्या चाहते हैं” शीर्षक से अपनी ताजा रिपोर्ट जारी की है. दिल्ली प्रेस क्लब में जारी इस रिपोर्ट ने विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच दलित समाज की वास्तविक स्थिति को सामने रखा है. रिपोर्ट बताती है कि बीते दो दशकों से सत्ता में रहे नेतृत्व ने दलितों की जिंदगी में कोई ठोस सुधार नहीं किया है बल्कि हालात अब भी उतने ही बदतर हैं.
इस सर्वेक्षण को बिहार के करीब 25 जिलों में 18,581 दलित परिवारों से सीधे बातचीत के आधार पर तैयार किया गया. पटना, गया, मुजफ्फरपुर, पश्चिम चंपारण, मोतिहारी और दरभंगा जैसे प्रमुख जिलों में दलित समुदाय के लोगों ने अपनी समस्याएं खुलकर सामने रखीं. एनएसीडीएओआर के प्रमुख अशोक भारती ने कहा कि हर चुनाव में दलितों की आवाज को किनारे कर दिया जाता है और उनकी असली चिंताएं राजनीतिक एजेंडा नहीं बन पातीं.
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बिहार में बीते 20 सालों से विकास के नाम पर जो तस्वीर दिखाई गई, वह दलित समाज की वास्तविकता से बिल्कुल उलट है. आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में 62% दलित अब भी निरक्षर हैं और 63% के पास रोजगार नहीं है. दलित परिवारों की औसत मासिक आय मात्र 6,480 रुपये पाई गई है. 2013-14 में दलितों के लिए बजट आवंटन 2.59% था जो घटकर अब 1.29% पर आ गया है. सवाल यह उठता है कि जब हर पांचवां बिहारी दलित है, तो उन्हें विकास की मुख्यधारा में जगह क्यों नहीं दी गई.
रिपोर्ट में शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, भूमि अधिकार, आवास और सामाजिक सुरक्षा जैसे प्रमुख मुद्दों को उठाया गया है. यह भी सामने आया कि जिन परियोजनाओं के तहत सड़कें और पुल बने, उन्हीं के लिए हजारों दलितों के घर बिना पुनर्वास तोड़ दिए गए. कई इलाकों में विस्थापित दलित परिवार आज भी सड़क किनारे झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं. सामाजिक कार्यकर्ता उमेश कुमार मांझी ने कहा कि विकास के नाम पर हमारा सामाजिक ढांचा तोड़ दिया गया, हमारा बचपन, हमारी संस्कृति सब छीन लिया गया.
रिपोर्ट यह भी बताती है कि नीतीश कुमार के शासनकाल में दलितों को “विकास पुरुष” की छवि से कोई फायदा नहीं मिला. इसके उलट, लालू प्रसाद यादव के दौर में कम से कम दलितों को घर और आवाज मिली थी. एनएसीडीएओआर ने 20 बिंदुओं को शामिल करने की मांग रखी हैं जिनमें सरकारी सेवाओं में भेदभाव खत्म करने, दलित महिलाओं की शिक्षा पर विशेष ध्यान देने और मुख्यमंत्री के अधीन एक उच्चस्तरीय समिति बनाने की बात शामिल है.
चुनावी माहौल में जारी इस रिपोर्ट ने एक अहम सवाल उठाया है कि जब दलित बिहार की राजनीतिक गणित में निर्णायक भूमिका रखते हैं, तो उनकी बुनियादी मांगें मैनिफेस्टो का हिस्सा क्यों नहीं बनतीं. यही वजह है कि इस बार दलित समुदाय चाहता है कि चुनाव सिर्फ वादों का नहीं, अधिकारों का सवाल बने.