National News: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 नवंबर को श्री राम जन्मभूमि परिसर में आयोजित होने वाले ध्वजारोहण समारोह में शामिल होंगे. इस बात की पुष्टि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने की है. मिश्रा ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं कहा था कि उन्होंने यह संकल्प लिया था कि जब तक भगवान राम के भव्य मंदिर का निर्माण शुरू नहीं हो जाता, वह अयोध्या नहीं जाएंगे. अब जब यह सपना साकार हो गया है, तो वह ध्वजारोहण के इस ऐतिहासिक अवसर पर अयोध्या पहुंचेंगे.
नृपेंद्र मिश्रा ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के साथ पांच से छह वर्षों तक निकटता से काम किया है और इस दौरान उन्होंने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि राम मंदिर से जुड़ी न्यायिक प्रक्रिया अपने रास्ते पर निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ती रहे. मिश्रा ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री मोदी इस पूरे अभियान को सिर्फ एक धार्मिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय भावनाओं से जुड़ा आंदोलन मानते हैं, जिसका केंद्र विश्वास और न्याय दोनों हैं.
राम जन्मभूमि परिसर में ध्वजारोहण समारोह को लेकर प्रशासनिक तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. अयोध्या में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जा रहे हैं. मंदिर निर्माण कार्य अंतिम चरण में पहुंच चुका है और ट्रस्ट की ओर से यह संकेत भी दिया गया है कि आने वाले महीनों में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम की तिथि भी घोषित की जा सकती है.
राजनीतिक तौर पर भी यह कार्यक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी का अयोध्या आगमन न सिर्फ धार्मिक भावना से जुड़ा होगा बल्कि इसे राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है. भाजपा के लिए राम मंदिर का निर्माण एक लंबे संघर्ष की परिणति है, जिसे पार्टी अपने वैचारिक आधार और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती रही है.
अयोध्या में प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति में राम मंदिर की केंद्रीय भूमिका को एक बार फिर रेखांकित करता है. मंदिर निर्माण की प्रक्रिया भाजपा के लिए वैचारिक विजय का प्रतीक बन चुकी है और इस कार्यक्रम में मोदी की मौजूदगी से पार्टी अपने समर्थक वर्ग को मजबूत संदेश देने की कोशिश करेगी. आने वाले चुनावी माहौल में यह कार्यक्रम जनभावनाओं को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभा सकता है, वहीं विपक्ष के लिए यह चुनौती होगी कि वह इसे धार्मिक भावनाओं से ऊपर उठकर विकास और समावेश के मुद्दों पर संतुलित जवाब दे सके.