Ghatshila By-Elections: झारखंड में घाटशिला विधानसभा उपचुनाव की सरगर्मी के बीच भाजपा में भगदड़ मच गई है, सूत्रों की माने तो संगठन सब तरफ असंतोष की लहर चल रही है. गुरुवार को जमशेदपुर महानगर भाजपा से जिला परिषद उपाध्यक्ष पंकज सिन्हा समेत सैकड़ों नेता पार्टी छोड़कर झारखंड मुक्ति मोर्चा में शामिल हो गए. झामुमो प्रवक्ता कुणाल षाडंगी ने ट्वीट कर तस्वीरें शेयर कीं और लिखा, "अभी तो पार्टी शुरू हुई है" उनका यह पोस्ट संकेत देता है कि और कई नेता आने वाले हैं. सूत्र ये भी बताते हैं कि भाजपा जिला अध्यक्ष हो या ग्रामीण नेता, सभी की कार्यशैली से कार्यकर्ता मायूस हैं. योग्य नेताओं की अनदेखी और पदाधिकारियों की दुकानदारी ने हालात बना दिए हैं कि लोग दूसरे दरवाजे की ओर रुख कर रहे हैं. भाजपा के आलाकमान को अब हस्तक्षेप करना पड़ सकता है वरना झारखंड में पार्टी का भविष्य खतरे में पड़ सकता है.
यह भगदड़ घाटशिला उपचुनाव के लिए भाजपा प्रत्याशी बाबूलाल सोरेन के लिए बुरी खबर है, जो पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के बेटे हैं और संगठन को मजबूत करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. बाबूलाल ने ग्रामीण क्षेत्रों में कैंपिंग की, प्रचार का सिस्टम बनाया, लेकिन पार्टी के भीतर ही घाव उभर आए हैं. प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष आदित्य साहू ने जमकर ताकत लगाई लेकिन संगठन की कमजोरी छिप नहीं रही. सबसे बड़ा सवाल यह है कि अर्जुन मुंडा और पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास जैसे बड़े नेता चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? दोनों स्थानीय हैं लेकिन न प्रचार के लिए घाटशिला गए न प्रभाव का इस्तेमाल किया. सांसद विद्युत वरण महतो कुछ बार गए लेकिन उनकी भूमिका सीमित रही. भाजपा नेता अभय सिंह और अन्य आते जाते रहे लेकिन मुंडा और दास की अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी हुई है. दावों के मुताबिक, भाजपा ने घाटशिला में सिर्फ एक बार जीत हासिल की है, ऐसे में संगठन कमजोर होने से हार का खतरा बढ़ गया है.
वहीं झामुमो ने संगठन को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. सभी मंत्री, विधायक, सांसद, कैंप कर रहे हैं और सोमेश सोरेन को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक रखी है. भाजपा के ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष चरम पर है जहां दावों के मुताबिक योग्य कार्यकर्ता हाशिए पर हैं और गैर योग्य पदाधिकारी दुकान चला रहे हैं. बताया जा रहा है कि भाजपा में आंतरिक गुस्सा बढ़ रहा है और क्राइसिस मैनेजमेंट न होने से हालात बिगड़ रहे हैं. घाटशिला उपचुनाव भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण है जहां चंपई सोरेन के बेटे की प्रतिष्ठा दांव पर है लेकिन संगठन की कमजोरी और बड़े नेताओं की चुप्पी ने मैच को रोमांचक बना दिया है.
यह भगदड़ झारखंड में भाजपा के संगठनात्मक कमजोरी को उजागर करती है जहां ग्रामीण महानगर असंतोष से पार्टी टूट रही है. कई नेताओं का झामुमो में जाना वोट बैंक शिफ्ट का संकेत है जो घाटशिला उपचुनाव को झामुमो के पक्ष में कर सकता है. बाबूलाल सोरेन की कोशिशें सराहनीय हैं लेकिन बड़े नामों की अनुपस्थिति सवाल खड़ी करती है कि यह आंतरिक कलह है या रणनीति? कुल मिलाकर भाजपा को आलाकमान हस्तक्षेप से संगठन सुधारना होगा वरना झारखंड में हार की लाइन लग सकती है. यह उपचुनाव राज्य राजनीति का आईना बनेगा.