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  • 2025-11-05

Big Breaking National: भारत में अमीरी की खाई और गहरी, G 20 रिपोर्ट में खुलासा, सबसे अमीर 1 प्रतिशत की संपत्ति 23 साल में 62 प्रतिशत बढ़ी

Big Breaking National: भारतीय जनता पार्टी की सरकार के कथनी और करनी में बहुत अंतर दिखाई देता यह बात यहां इसलिए कही जा रही हैं क्योंकि भाजपा के नेता चिल्ला चिल्ला कर यह कहते नहीं थकते कि देश में 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आ गए है, लेकिन वे कभी इसकी प्रमाणिकता नहीं साबित कर पाएं हैं, सिर्फ उनकी तथाकथित पीआर टीम जो उन्हें रटवा देती है वह कैमरे के सामने बड़बड़ा देते है और फिर तथाकथित पत्रकार अपने चैनल के माध्यम से इसका महिमामंडन करते नहीं थकते. भाजपाई सत्य से कितने नजदीक है इसका अंदाजा भाजपा नेता रवि किशन के उस बयान से लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने गोरखपुर की तुलना स्पेन से कर दी थी. उनके इस बयान से यह साफ हो गया है कि भाजपाई केवल लोगों को सपने दिखाते है झूठ के लंबे-लंबे पुल बांधते हैं. पिछले 11 साल से अधिक समय से शासन कर रही भाजपा सरकार में आम आदमी के जेब में तो पैसे आए नहीं उल्टा GST उनकी जेब में डाका डाल रही है. लेकिन पूंजीपतियों पर सरकार पूरी तरह मेहरबान नजर आती है और इसी का फल है कि आज देश में अमीर और गरीब लोगों के बीच खाई बढ़ती ही जा रही है. शिक्षा, स्वास्थ्य, रेलवे और आम आदमी के उपभोग की तमाम सेवा प्राइवेट मोड पर चल रही है और गरीबी का मखौल बन रहा है.

भारत में सबसे अमीर 1 प्रतिशत लोगों की संपत्ति 62 प्रतिशत बढ़ी
दक्षिण अफ्रीका की G 20 अध्यक्षता में जारी एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट ने वैश्विक असमानता पर गंभीर चिंता जताई है. रिपोर्ट के अनुसार भारत में सबसे अमीर 1 प्रतिशत लोगों की संपत्ति वर्ष 2000 से 2023 के बीच 62 प्रतिशत बढ़ी है. यह अध्ययन नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिट्ज के नेतृत्व में किया गया और इसमें आगाह किया गया है कि विश्व में आर्थिक असमानता अब संकट के स्तर पर पहुंच गई है जिससे लोकतंत्र, आर्थिक स्थिरता और जलवायु लक्ष्यों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है.

विश्व स्तर पर शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों ने 41 प्रतिशत हिस्सा हासिल किया
वैश्विक असमानता पर स्वतंत्र विशेषज्ञों की G 20 असाधारण समिति ने बताया कि विश्व स्तर पर शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों ने वर्ष 2000 से 2024 के बीच पैदा हुई नई संपत्ति का 41 प्रतिशत हिस्सा हासिल किया जबकि दुनिया की आधी आबादी को मात्र 1 प्रतिशत संपत्ति मिली. समिति में अर्थशास्त्री जयति घोष, विनी बयानीमा और इमरान वालोदिया भी शामिल हैं. रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ हद तक असमानता कम हुई है क्योंकि चीन और भारत जैसे जनसंख्या वाले देशों में प्रति व्यक्ति आय बढ़ी है लेकिन इसके बावजूद सबसे अमीर तबके ने अधिकतर देशों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है और अब वे वैश्विक संपत्ति के 74 प्रतिशत पर नियंत्रण रखते हैं.

अंतरराष्ट्रीय असमानता समिति बनाने की मांग
रिपोर्ट में कहा गया कि चीन में शीर्ष 1 प्रतिशत की संपत्ति इसी अवधि में 54 प्रतिशत बढ़ी है. अध्ययन में यह भी बताया गया कि आर्थिक असमानता कोई अपरिहार्य स्थिति नहीं बल्कि नीतिगत फैसला है और राजनीतिक इच्छाशक्ति से इसे बदला जा सकता है. रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी समिति की तर्ज पर एक अंतरराष्ट्रीय असमानता समिति बनाई जाए जो देशों को असमानता के आंकड़े और नीतिगत मार्गदर्शन उपलब्ध कराए. इसमें कहा गया कि अधिक असमानता वाले देशों में लोकतंत्र के कमजोर होने की आशंका 7 गुना अधिक रहती है.

वैश्विक गरीबी में कमी की रफ्तार लगभग थमी
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 के बाद से वैश्विक गरीबी में कमी की रफ्तार लगभग थमी है और कई क्षेत्रों में गरीबी बढ़ी भी है. दुनिया के 2.3 अरब लोग मध्यम या गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं जो कोविड काल से पहले की तुलना में 33.5 करोड़ अधिक है. वैश्विक आबादी का बड़ा हिस्सा अभी भी प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है जबकि 1.3 अरब लोग स्वास्थ्य खर्च के बोझ के कारण गरीबी में जीवन गुजार रहे हैं.

यह रिपोर्ट वैश्विक अर्थव्यवस्था के उस कड़वे सच को उजागर करती है जहां विकास की रफ्तार तो दिखती है लेकिन उसका लाभ सीमित वर्ग तक सिमट गया है. भारत जैसे देश जहां जनसंख्या की बड़ी हिस्सेदारी युवा और गरीब वर्ग की है वहां इस असमानता का असर सामाजिक तानेबाने और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर गहरा पड़ सकता है. नीति निर्माण में असमानता को केंद्र में लाने और कल्याणकारी ढांचे को मजबूत करने की जरूरत साफ नजर आती है वरना अमीरी और गरीबी की यह खाई भविष्य में और गहरी हो सकती है.
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