Jharkhand Police: झारखंड की सियासत और सिस्टम में एक बार फिर मचा भूचाल... राज्य के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी ने अचानक थामा इस्तीफे का रास्ता! कौन है ये “दबंग डीजीपी” जिन्होंने हेमंत सरकार को झटका दे दिया? क्या ये इस्तीफा महज औपचारिकता है, या फिर सत्ता के भीतर कोई गहरी साजिश चल रही है?कभी निलंबन, कभी पुनर्नियुक्ति और अब इस्तीफा... आखिर अनुराग गुप्ता के इस्तीफे के पीछे की असली कहानी क्या है? कौन बना सरकार का नया पसंदीदा चेहरा? और क्यों मचा है झारखंड पुलिस महकमे में हड़कंप?“क्या ये इस्तीफा झारखंड की ब्यूरोक्रेसी की राजनीति का ट्रेलर है... या आने वाले बड़े फेरबदल की पटकथा?”झारखंड पुलिस के डीजीपी अनुराग गुप्ता ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. हालांकि राज्य सरकार की ओर से अभी तक उनके इस्तीफे की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मंगलवार देर शाम अनुराग गुप्ता ने अपना इस्तीफा मुख्यमंत्री आवास में सौंप दिया था. उनके इस्तीफे की खबर सामने आते ही पुलिस महकमे से लेकर राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है.
1990 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं अनुराग गुप्ता
अनुराग गुप्ता 1990 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं. उन्होंने इंजीनियरिंग में बीई (इलेक्ट्रिकल) की डिग्री हासिल की थी. इसके बाद उन्होंने यूपीएससी परीक्षा पास कर भारतीय पुलिस सेवा में प्रवेश किया. झारखंड पुलिस में उनका कार्यकाल हमेशा चर्चाओं और विवादों में रहा है.
सेवा अवधि को लेकर लंबे समय से केंद्र और राज्य सरकार के बीच तकरार
अनुराग गुप्ता की सेवा अवधि को लेकर लंबे समय से केंद्र और राज्य सरकार के बीच तकरार जारी थी. दरअसल, अनुराग गुप्ता की सेवानिवृत्ति की तारीख 30 अप्रैल 2025 तय थी. इसके बावजूद राज्य सरकार ने जनवरी 2025 में बने नए नियम के तहत उन्हें दो फरवरी 2025 को नियमित डीजीपी नियुक्त किया और दो वर्ष का सेवा विस्तार दे दिया था. वहीं केंद्र सरकार ने "ऑल इंडिया सर्विस रूल" का हवाला देते हुए झारखंड सरकार को पत्र भेजकर कहा था कि अनुराग गुप्ता 30 अप्रैल 2025 को सेवानिवृत्त हो जाएंगे और उन्हें सेवा विस्तार नहीं मिल सकता है. इस विवाद के बाद झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी थी.
फरवरी 2020 में हेमंत सोरेन ने अनुराग गुप्ता किया था निलंबित
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस हेमंत सोरेन सरकार ने अनुराग गुप्ता को प्रभारी डीजीपी और बाद में नियमित डीजीपी बनाया, उसी सरकार ने फरवरी 2020 में उन्हें निलंबित कर दिया था. उन पर आरोप था कि वर्ष 2016 में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान उन्होंने भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में काम करते हुए बड़कागांव की तत्कालीन विधायक पर दबाव बनाया था. अनुराग गुप्ता ने इस फैसले के खिलाफ केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी कैट में याचिका दायर की थी. बाद में कैट ने उनके निलंबन को रद्द करने का आदेश दिया और अप्रैल 2022 में उन्हें बहाल कर दिया गया.
2024 में हेमंत सरकार ने फिर बनाया DGP
जुलाई 2024 में हेमंत सरकार ने उन्हें फिर से प्रभारी डीजीपी बनाया था. हालांकि विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग के निर्देश पर उन्हें हटा दिया गया था. लेकिन नवंबर 2024 में सरकार बनने के बाद उन्हें एक बार फिर प्रभारी डीजीपी की जिम्मेदारी दे दी गई.
कई अहम पदों पर रह चुके है अनुराग गुप्ता
अनुराग गुप्ता ने अपने लंबे करियर में कई अहम पदों पर काम किया है. वे रांची के एसएसपी, गढ़वा, गिरिडीह और हजारीबाग के एसपी रहे हैं. बोकारो रेंज के डीआईजी और एंटी करप्शन ब्यूरो, सीआईडी, तथा ट्रेनिंग के डीजी पद पर भी उन्होंने अपनी सेवाएं दी हैं. उनकी गिनती राज्य के सख्त और दबंग आईपीएस अधिकारियों में होती है. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने नक्सल प्रभावित इलाकों में पुलिस और आम जनता के बीच संवाद कायम करने की दिशा में कई पहल की थी. नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने की उनकी कोशिशों को राज्य स्तर पर सराहा गया था. उन्हें राष्ट्रपति की ओर से वीरता पुरस्कार भी मिल चुका है.
प्रशांत सिंह होंगे झारखंड के नए DGP
अनुराग गुप्ता के इस्तीफे के बाद सरकार में नए डीजीपी को लेकर मंथन शुरू हो गया है. सूत्रों के अनुसार, देर शाम सरकार के शीर्ष स्तर पर प्रशांत सिंह के नाम पर सहमति बन गई है. प्रशांत सिंह 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और वर्तमान में पुलिस मुख्यालय में डीजी पद पर पदस्थापित हैं. डीजी रैंक में फिलहाल तीन अधिकारी हैं- अनिल पाल्टा, प्रशांत सिंह और एमएस भाटिया. सरकार की पसंद प्रशांत सिंह बताए जा रहे हैं. किसी भी समय उनकी नियुक्ति को लेकर आधिकारिक आदेश जारी किया जा सकता है.
वहीं भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री सीपी सिंह ने अनुराग गुप्ता के इस्तीफे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि देर आए दुरुस्त आए, इतनी फजीहत के बाद उनका इस्तीफा देना आश्चर्यजनक है.
अनुराग गुप्ता का इस्तीफा केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं बल्कि सत्ता और सिस्टम के बीच चल रहे टकराव की कहानी भी है. केंद्र और राज्य के बीच नियमों की व्याख्या को लेकर पैदा हुआ विवाद दरअसल नौकरशाही की स्वायत्तता और राजनीतिक प्रभाव के बीच खींचतान को उजागर करता है. जिस अधिकारी को कभी "दबंग डीजीपी" कहा गया, उसे उसी सरकार के अंतर्गत बार-बार निलंबन, पुनर्नियुक्ति और अंततः इस्तीफे के दौर से गुजरना पड़ा. यह घटना राज्य की प्रशासनिक स्थिरता पर सवाल खड़े करती है. साथ ही यह भी संकेत देती है कि झारखंड की ब्यूरोक्रेसी अब केवल सेवा नहीं, सत्ता समीकरणों का भी हिस्सा बन चुकी है.