Lohardaga News: लोहरदगा जिले के बरही स्थित मॉडल महिला कॉलेज, जिसे जनवरी 2021 में तत्कालीन राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने बड़े धूमधाम से उद्घाटित किया था, आज बदहाली की मिसाल बन चुका है. जिस कॉलेज को प्रदेश की बेटियों की उच्च शिक्षा का केंद्र बनाने का सपना दिखाया गया था, वह अब केवल एक ढांचा बनकर रह गया है. चार साल बीत जाने के बाद भी यहां नियमित कक्षाएं शुरू नहीं हो सकी हैं.
कॉलेज में करीब 800 छात्राओं का नामांकन है, लेकिन हकीकत यह है कि कक्षाओं में मुश्किल से दर्जनभर छात्राएं नजर आती हैं. कारण साफ है, कॉलेज में शिक्षकों की भारी कमी है. पूरे कॉलेज में केवल दो अनुबंधित शिक्षक हैं. वहीं, बीएस कॉलेज के प्राचार्य को यहां का प्रभारी प्राचार्य बनाया गया है, जो बताया जाता है कि केवल 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही कॉलेज आते हैं.
गुरुवार दोपहर का नजारा कॉलेज की सच्चाई बयान करता है. पूरे परिसर में केवल पांच छात्राएं, दो शिक्षिकाएं और कुछ कर्मचारी नजर आए. कॉलेज में पढ़ाई की जगह सन्नाटा पसरा हुआ है. कॉमर्स समेत नौ विषयों में नामांकन लिया जाता है, लेकिन 95 फीसदी छात्राएं कॉलेज नहीं आतीं. उनका कहना है कि यहां क्लास लगना किसी चमत्कार से कम नहीं होता.
कॉलेज की बुनियादी सुविधाओं की स्थिति भी दयनीय है. पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है, शौचालय गंदगी से भरे पड़े हैं और प्रयोगशालाओं के उपकरण कबाड़ में बदल चुके हैं. कुड़ुख विभाग की शिक्षिका डॉ प्रमिला उरांव बताती हैं कि शिक्षकों की भारी कमी है और स्वच्छता समेत अन्य सुविधाओं की हालत बेहद खराब है. उन्होंने कहा कि इन समस्याओं के समाधान की दिशा में तुरंत कदम उठाए जाने की जरूरत है.
2021 में उद्घाटन के वक्त राज्यपाल, विश्वविद्यालय के कुलपति, सांसद, विधायक और मंत्री मंच पर मौजूद थे. बेटियों की शिक्षा को लेकर कई वादे और घोषणाएं की गई थीं. लेकिन आज वह सब बातें खोखली साबित हो चुकी हैं.
रांची विश्वविद्यालय के डीएसडब्ल्यू सुदेश कुमार साहू के मुताबिक, राज्य में बने चार मॉडल महिला कॉलेजों की इमारतें तो तैयार कर दी गईं, लेकिन शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई. यह जिम्मेदारी सरकार और झारखंड लोक सेवा आयोग की है. उन्होंने कहा कि जब पुराने कॉलेजों में ही शिक्षकों की कमी है तो नए कॉलेजों में व्यवस्था कैसे चलेगी.
लोहरदगा का मॉडल महिला कॉलेज इस बात का उदाहरण बन गया है कि कैसे सरकारी घोषणाएं और उद्घाटन सिर्फ दिखावे तक सीमित रह जाते हैं. चार साल में न शिक्षक आए, न पढ़ाई शुरू हुई. बेटियों की शिक्षा का सपना अधूरा रह गया. यह सिर्फ एक कॉलेज की कहानी नहीं, बल्कि झारखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई है, जहां इमारतें हैं, लेकिन शिक्षा गायब है.