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  • 2025-11-09

BIG NATIONAL ISSUE: “आजादी के 75 साल बाद भी, हम हवा के गुलाम हैं”, भारत की दम तोड़ती हवा, जब मंत्रालय मौन है और लोग मर रहे हैं

BIG NATIONAL ISSUE: क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भी है. लेकिन क्या कभी आपने इस मंत्रालय से कोई ठोस कदम या बड़ा फैसला सुना है? इसके साथ ही आपने कभी इस मंत्रालय के मंत्रियों का नाम भी नहीं सूना होगा? चलिए हम आपको बताये देते हैं, मंत्री जी का नाम भूपेंद्र यादव और इसके साथ राज्य मंत्री के रूप में किर्तिवर्धन सिंह भी पदस्थापित है. मंत्री भूपेंद्र यादव की अगर सोशल मिडिया हेंडल X देखें तो वे सिर्फ मोदी जी की पोस्ट को रिपोस्ट करते हैं, मंत्रालय से संबंधित कामकाज कम ही आपको देखने मिलेगा. मतलब ये है कि मंत्री जी अपने बंगले में एयर प्यूरीफायर से शुद्ध हवा लेकर आराम फरमा रहे होंगे. 

सरकार और मेन स्ट्रीम मिडिया दोनों ही मौन
मेनस्ट्रीम मीडिया को ऐसी खबरें दिखाने के पैसे नहीं मिलते. टीवी चैनल्स और अखबार बड़े उद्योगों के विज्ञापन पर चलते हैं. प्रदूषण, पेड़, पर्यावरण या जलवायु जैसे मुद्दे उनके एजेंडे में नहीं होते. नतीजा ये है कि देश के कई छोटे-बड़े शहर आज जहरीली हवा में दम तोड़ रहे हैं, और सरकार से लेकर मंत्री तक इस पर मौन हैं.

वायु प्रदूषण की स्थिति बेहद चिंताजनक
वर्तमान में वायु प्रदूषण की स्थिति बेहद चिंताजनक है, जहां 9 नवंबर 2025 तक भारत के अधिकांश प्रमुख शहरों में एयर क्वालिटी इंडेक्स खतरनाक स्तर पर है. आईक्यूएयर और एयर क्वालिटी इंडेक्स डॉट इन के डेटा से राष्ट्रीय औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स 289 पर है, जो गंभीर श्रेणी में आता है, और पीएम 2.5 का स्तर 165 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक पहुंच चुका है. दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित है, जहां दृश्यता 200 मीटर से नीचे गिर गई है. छोटे शहर जैसे श्री गंगानगर राजस्थान में और सिवानी हरियाणा में वैश्विक स्तर पर सबसे प्रदूषित सूची में शामिल हैं. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 8 नवंबर के बुलेटिन से अपडेटेड डेटा दिखाता है कि दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स 400 से अधिक है, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में 380 से 420, गुरुग्राम में भी इतना ही, श्री गंगानगर में 450 से अधिक, सिवानी में 440 से अधिक, लुधियाना में 384, भिवाड़ी में 370, आगरा में 128 जो मध्यम है, अहमदाबाद में 183 मध्यम, बैंगलोर में 120 मध्यम, कोलकाता में 220 खराब, चेन्नई में 110 मध्यम, पुणे में 51 अच्छा, जयपुर में 280 खराब और लखनऊ में 250 खराब स्तर पर है. ये आंकड़े दैनिक बदलते रहते हैं, और 2025 में 93 भारतीय शहर विश्व के 100 सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल हैं. छोटे शहरों में मॉनिटरिंग की कमी से वास्तविक स्थिति और भी खराब हो सकती है. यही हाल अन्य औद्योगिक शहरों का भी है जहां लोग सांस लेने के लिए शुद्ध हवा तक को तरस रहे हैं.

क्या कहती है रिपोर्ट्स
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट कहती है कि भारत में हर साल 14 से 17 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण के कारण होती है. 2024 में प्रकाशित लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वायु प्रदूषण देश की सबसे बड़ी पर्यावरणीय मृत्यु का कारण बन चुका है. प्रदूषण के कारण स्ट्रोक, फेफड़ों का कैंसर, हृदय रोग, दमा और बच्चों में श्वसन संबंधी बीमारियों में तेजी से वृद्धि हो रही है. दिल्ली जैसे शहरों में बच्चों के फेफड़े 12 साल की उम्र में 40% तक क्षतिग्रस्त पाए जा रहे हैं.

वहीं लैंसेट काउंटडाउन 2025 रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण से जुड़ी मौतें तेजी से बढ़ रही हैं, और पीएम 2.5 का योगदान सबसे बड़ा है. स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025 रिपोर्ट से पता चलता है कि 2023 में 20 लाख मौतें हुईं, जो वैश्विक 81 लाख मौतों का 25 प्रतिशत हैं, और इनमें से 90 प्रतिशत गैर-संचारी रोग जैसे हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारियां और कैंसर से जुड़ी हैं. 2022 में पीएम 2.5 से 17 लाख मौतें हुईं, जो जीडीपी का 9.5 प्रतिशत नुकसान का कारण बनीं. एशिया में 1990 से 2021 तक भारत में पीएम 2.5 एक्सपोजर से 95 लाख अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं. दिल्ली में विशेष रूप से 2023 में 15 प्रतिशत मौतें प्रदूषण से जुड़ी थीं, यानी हर सात में से एक मौत. ये मौतें मुख्यतः बुजुर्गों, बच्चों और अस्थमा रोगियों में देखी जा रही हैं, और 2025 में अनुमानित 20 से 25 लाख मौतें होने की आशंका है क्योंकि प्रदूषण स्तर रिकॉर्ड तोड़ रहा है.

पर्यावरण मंत्रालय क्या कर रहा है
भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की वेबसाइट पर नजर डालें तो आपको वायु प्रदूषण को लेकर कोई ठोस राष्ट्रीय कार्ययोजना (National Action Plan) का अद्यतन नहीं मिलेगा. मंत्रालय ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) 2019 में शुरू किया था, जिसका लक्ष्य 2024 तक प्रदूषण को 20 से 30 प्रतिशत तक घटाना था. लेकिन 2025 आने वाला है और हवा पहले से और ज्यादा जहरीली हो गई है. मंत्रालय की वेबसाइट पर जो रिपोर्ट्स दी गई हैं, वे या तो पुरानी हैं या दिखावटी प्रगति की बातें करती हैं. जमीनी स्तर पर इसका असर न के बराबर है.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की हालिया रिपोर्ट बताती है कि देश के 131 शहरों में वायु गुणवत्ता मानक से बहुत नीचे है. इनमें से कई शहरों में साल के अधिकांश दिनों में AQI “खराब” से “गंभीर” श्रेणी में दर्ज किया गया है. दिल्ली, गाजियाबाद, पटना, मुजफ्फरपुर, लुधियाना, और धनबाद सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल हैं.

IIT कानपुर की एक स्टडी के अनुसार, दिल्ली की हवा में 40 प्रतिशत प्रदूषण निर्माण कार्यों, धूल और औद्योगिक उत्सर्जन से आता है, जबकि बाकी का बड़ा हिस्सा वाहनों और फसल जलाने से. लेकिन इसके बावजूद सरकार की प्राथमिकता अभी भी निर्माण, कॉरपोरेट और वाहनों के विस्तार पर केंद्रित है.

वायु प्रदूषण को एक “मूक महामारी” में बदल रही सरकार
सरकार की नीति और प्रशासनिक रवैये ने वायु प्रदूषण को एक “मूक महामारी” में बदल दिया है. अस्पतालों में सांस की बीमारियों के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है. दिल्ली AIIMS और पटना मेडिकल कॉलेज में फेफड़ों के मरीजों की संख्या बीते पांच वर्षों में दोगुनी हो चुकी है. यह सब जानते हुए भी मंत्री और मंत्रालय इस पर मौन साधे हुए हैं.

यह मौन सिर्फ एक मंत्री का नहीं, बल्कि एक ऐसे सिस्टम का है जो आर्थिक विकास के नाम पर लोगों की सांसों की कीमत पर समझौता कर चुका है. प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक मानवाधिकार संकट बन चुका है. और जब तक सरकार इसे गंभीरता से नहीं लेगी, तब तक भारत का हर नागरिक ज़हर से भरी हवा में जीने और मरने को मजबूर रहेगा.

पर्यावरण मंत्रालय की वेबसाइट पर ताजा अपडेट्स सीमित हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम 2019 से उनका प्रमुख हथियार है, जिसका लक्ष्य 2024-25 तक पीएम10 में 20 से 30 प्रतिशत कमी था, जो अब 2026 तक 40 प्रतिशत कर दिया गया है. हालांकि, 130 कवर शहरों में से केवल 41 ने लक्ष्य हासिल किया है. हालिया कदमों में दिल्ली में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान का स्टेज-थ्री लागू किया गया है, जिसमें निर्माण कार्य रोका गया है. मॉनिटरिंग के लिए प्राना पोर्टल पर 500 से अधिक स्टेशन हैं, लेकिन 28 शहरों में अभी भी कमी है. ट्रेसिंग द हेजी एयर 2025 रिपोर्ट में कार्यक्रम की मिश्रित सफलता बताई गई है, और मंत्रालय ने पराली जलाने पर सख्ती की है, लेकिन मौतों पर कोई स्पष्ट नीति नहीं है. चुनौतियां फंडिंग की कमी और राज्य-स्तरीय क्रियान्वयन के धीमेपन से जुड़ी हैं, और विशेषज्ञों का कहना है कि इलेक्ट्रिक वाहनों और हरित ऊर्जा पर अधिक फोकस जरूरी है. मंत्रालय सक्रिय है, लेकिन मौतों के आंकड़ों पर मौन सा सन्नाटा छाया हुआ है.

जीडीपी को भी हो रहा नुकसान
वायु प्रदूषण भारत की अर्थव्यवस्था को 9.5 प्रतिशत जीडीपी का नुकसान पहुंचा रहा है, साथ ही लाखों जिंदगियां लील रहा है. 9 नवंबर 2025 को धुंध की चादर में छिपे ये आंकड़े एक चेतावनी हैं कि यदि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम जैसे प्रयासों को मजबूत नहीं किया गया तो संकट और गहराएगा. व्यक्तिगत स्तर पर मास्क पहनना, कार्पूलिंग करना और पेड़ लगाना शुरू करें, जबकि सरकार से सख्त कानून और पारदर्शी रिपोर्टिंग की मांग करें. साफ हवा हर नागरिक का अधिकार है, और इसे हासिल करने का समय आ गया है.
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