Jharkhand Politics: झारखंड की राजनीति इस समय अनिश्चितताओं और कयासों के दौर से गुजर रही है. भाजपा राज्य में दिशा खोती दिखाई दे रही है, वहीं हेमंत सोरेन सरकार भारी वित्तीय दबाव से जूझ रही है. 50 लाख महिलाओं को मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना के तहत लाभ देने में सरकार हर साल 15 हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर रही है, जिसके कारण कोष पर बड़ा बोझ पड़ रहा है. इसी बीच राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि हेमंत भाजपा के साथ हाथ मिलाएंगे या कांग्रेस में टूट होगी और झामुमो अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की कोशिश करेगा.
सरकार की माली हालत खराब
सरकार की माली स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि E-कल्याण की राशि और हर प्रखंड में डिग्री कॉलेज खोलने के लिए फंड जुटाने की कवायद लगातार जारी है, लेकिन जरूरत के मुताबिक संसाधन उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं. इसके साथ ही कई कल्याणकारी योजनाएं अधर में लटकते नजर आ रहे हैं. इतना तय है कि बिहार चुनाव के नतीजों का असर झारखंड के महागठबंधन पर जरूर पड़ेगा. राजद और कांग्रेस के बीच तनाव किसी से छुपा नहीं है. साथ ही मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी दिल्ली में डेरा जमाए हुए हैं, जिससे सियासी तापमान और बढ़ गया है.
भाजपा के साथ हेमंत को स्वीकार करेगी जनता?
जनता ने 2024 में हेमंत सोरेन को भारी जनमत के साथ सत्ता सौंपी थी. ऐसे में अगर वे भाजपा के साथ सरकार बनाते हैं तो एक बड़ा वर्ग इसे पसंद नहीं करेगा. खुद हेमंत भी तमाम केस मुकदमों और जेल की परिस्थितियों का सामना करने के बाद भाजपा के साथ गठबंधन करने को मजबूरी के तौर पर नहीं दिखाना चाहेंगे. लेकिन यह भी सच है कि केंद्र से फंड लाने के लिए भाजपा के साथ सामंजस्य बनाना उनके लिए जरूरी हो सकता है.
हेमंत और राहुल गांधी के रिश्ते दोस्ताना बताए जाते हैं, लेकिन बिहार में कांग्रेस की हुई दुर्गति के बाद झारखंड में कांग्रेस के साथ बने रहना झामुमो के लिए जोखिम भरा हो सकता है. नए साल में मार्च के अंत तक निकाय चुनाव होने की संभावना है. ऐसे में झामुमो हर मोर्चे पर खुद को मजबूत करने की रणनीति में जुटा है. सरकार चलाने के लिए फंड की उपलब्धता और सरकारी नियुक्तियों का सिलसिला जारी रखने के लिए हेमंत सरकार केंद्र पर दबाव बनाने और अपने राजनीतिक समीकरणों को नए सिरे से साधने की तैयारी कर रही है.