National News: केंद्र सरकार ने देश में मोबाइल सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा फैसला लिया है. दूरसंचार विभाग ने आदेश दिया है कि अब भारत में बनने वाले और विदेशों से आयात होने वाले सभी मोबाइल फोन में संचार साथी ऐप पहले से इंस्टॉल रहेगा. इसे फोन से हटाया नहीं जा सकेगा. यह नियम सभी कंपनियों पर लागू होगा जिनमें एपल, सैमसंग, शियोमी, ओप्पो और वीवो शामिल हैं. फैसले के बाद लोग यह जानने को उत्सुक हैं कि यह ऐप क्या है और इसका इस्तेमाल कैसे होगा.
यूजर्स के लिए ऐप को आसान बनाया जाएगा
निर्देशों के अनुसार फोन सेटअप करते समय यह ऐप स्क्रीन पर साफ दिखाई देना चाहिए. ऐप को खोलने में किसी तरह की दिक्कत नहीं होनी चाहिए और इसकी कोई सुविधा बंद नहीं रहनी चाहिए. यूजर को ऐप की सभी सेवाएं बिना किसी समय सीमा के उपलब्ध रहेंगी. लक्ष्य यह है कि हर यूजर इसे आसानी से इस्तेमाल कर सके.
विपक्ष ने उठाए सवाल, प्रियंका गांधी का बयान
संचार साथी ऐप को अनिवार्य किए जाने के बाद यह मुद्दा राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है. विपक्ष का आरोप है कि यह निजता पर हमला है. प्रियंका गांधी ने कहा कि यह जासूसी ऐप की तरह है और नागरिकों की निजी बातचीत में दखल देगा. उन्होंने कहा कि लोगों को सरकारी नजर से मुक्त निजी बातचीत का अधिकार होना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि साइबर सुरक्षा जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर नागरिक के फोन की निगरानी की जाए. उनके अनुसार यह तरीका सही नहीं है और नागरिक भी इससे खुश नहीं होंगे.
सरकार की मंशा क्या है
दूरसंचार विभाग ने मोबाइल कंपनियों को निर्देश दिया है कि अगले 90 दिनों के भीतर हर नया फोन इस ऐप के साथ आएगा. जो फोन पहले से बाजार में हैं उनमें यह ऐप सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए दिया जाएगा. सरकार का कहना है कि यह कदम नकली मोबाइल से लोगों को बचाने और दुरुपयोग की शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए उठाया गया है.
क्या है संचार साथी ऐप
यह ऐप वर्ष 2023 में शुरू किया गया था. इसका मुख्य उद्देश्य खोए हुए मोबाइल की शिकायत दर्ज करना और तुरंत उसे ब्लॉक करने की सुविधा देना है. यह संदिग्ध लिंक की रिपोर्ट दर्ज करने और किसी व्यक्ति के नाम पर कितने सिम सक्रिय हैं यह जानने में भी मदद करता है. ऐप के माध्यम से मोबाइल सुरक्षा और डिजिटल फ्रॉड पर निगरानी को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है.
संचार साथी ऐप को सभी फोन में अनिवार्य करने का फैसला डिजिटल सुरक्षा के लिहाज से बड़ा कदम है, लेकिन इससे निजता को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं. एक तरफ सरकार का दावा है कि यह कदम मोबाइल फ्रॉड और नकली फोन के कारोबार पर रोक लगाएगा. दूसरी तरफ विपक्ष और नागरिक अधिकार समूह इसे निगरानी के खतरे के तौर पर देख रहे हैं. फैसला आने वाले समय में देश में डिजिटल अधिकार और सुरक्षा के बीच संतुलन पर बड़ी बहस खड़ी करेगा.