National News: केंद्र की मोदी सरकार अपनी कार्यशैली में कोई बड़ा सुधार तो नहीं कर पा रही है, लेकिन नाम बदलने की कला में जरूर महारत हासिल कर चुकी है. नाम बदल देने से न तो किसी भवन का पता बदलने वाला है और न ही उस संस्था का काम काज सुधरने वाला है. लेकिन सरकार को कौन समझाए कि नाम बदलना विकास नहीं होता है. यह सिर्फ जनता के पैसों का अनावश्यक खर्च है. जिन इमारतों, दफ्तरों और सड़कों के नाम बदले जा रहे हैं, उनके रंग रोगन का पैसा अडानी और अंबानी नहीं देने वाले. इसकी कीमत आम जनता ही चुकाएगी, जो पहले से महंगाई और बेरोजगारी से परेशान है.
सरकार इतिहास को शोध, नवाचार या काम से नहीं, बल्कि नाम बदलकर दुबारा लिखना चाहती है ताकि सत्ता में रहते हुए खुद का महिमामंडन भी होता रहे. लेकिन इसे कोई कैसे समझाए कि इतिहास इमारतों के बदले नाम से नहीं, बल्कि जनता के लिए किए गए वास्तविक कामों से बनता है. नाम बदलकर सरकार शायद तात्कालिक सुर्खियां बटोर ले, मगर इससे न तो कोई उपलब्धि दर्ज होगी और न ही कोई समस्या हल होगी. उल्टा यह प्रवृत्ति आने वाले समय में इतिहास के उन्हीं पन्नों में दर्ज होगी जहां असली मुद्दों से बचने और दिखावे की राजनीति का जिक्र होता है.
केंद्र सरकार का इस बदलाव से देश के सभी राज्यों में राजभवन का नाम बदलकर लोकभवन हो गया है. इसके साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय को अब सेवा तीर्थ नाम दिया गया है. गृह मंत्रालय के निर्देश के बाद यह बदलाव 1 दिसंबर से लागू हो गया है. सरकार का कहना है कि यह परिवर्तन जनता केंद्रित शासन की सोच को दर्शाता है.
पहले भी बदले गए हैं नाम
मोदी सरकार के पिछले 11 वर्षों में कई स्थानों, सड़कों और संस्थानों के नाम बदले गए हैं. इनमें सबसे चर्चित उदाहरण राजपथ का है. इसका नाम बदलकर कर्तव्य पथ किया गया था. साल 2016 में रेसकोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग कर दिया गया था.
सरकार द्वारा नाम बदलने की यह प्रक्रिया मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने की राजनीति के रूप में देखी जा रही है. राजभवन को लोकभवन और PMO को सेवा तीर्थ नाम देने जैसे फैसले प्रतीकात्मक बदलाव हैं, जिनका जनता के जीवन पर कोई ठोस प्रभाव नहीं पड़ता. महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे असली मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय नाम बदलने पर जोर देना जनता के संसाधनों का अनावश्यक उपयोग है और इससे शासन की प्राथमिकताओं पर सवाल उठते हैं.