Bihar Elections: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले विपक्षी महागठबंधन गहरे असमंजस का सामना कर रहा है. पहले चरण की 121 सीटों के लिए नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन अब तक सीटों की आधिकारिक साझेदारी घोषित नहीं की गई है. इस देरी का परिणाम यह हुआ कि कई सीटों पर महागठबंधन के घटक दल एक-दूसरे के खिलाफ ही मैदान में उतर चुके हैं.
पहले चरण का मतदान छह नवंबर को होना है और सोमवार तक नामांकन वापस लेने की समय सीमा है. ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि अंतिम समय में कुछ सीटों पर समझौता हो सकता है, लेकिन वर्तमान स्थिति रणनीतिक एकता के बजाय अव्यवस्था का संकेत दे रही है.
महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, सीपीआई (एम-एल), सीपीआई और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) शामिल हैं. इसके बावजूद दर्जनों सीटों पर सहमति नहीं बन पाई है. कांग्रेस ने जहां 48 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी, वहीं सीपीआई (एम-एल) ने भी 20 नामों की घोषणा कर दी. इसी बीच वीआईपी ने 15 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. आरजेडी अपने चुनाव चिह्न पर प्रत्याशी मैदान में उतार रही है, परंतु आधिकारिक गठबंधन घोषणा अब तक अधर में है.
सूत्रों के मुताबिक कुटुंबा, लालगंज, वैशाली, बछवाड़ा और कहलगांव जैसी सीटों पर कांग्रेस और आरजेडी के बीच फ्रेंडली फाइट की स्थिति बन चुकी है. कहा जा रहा है कि कांग्रेस को करीब 61 सीटें मिल सकती हैं, जिनमें से सात से आठ पर सीधा टकराव संभव है.
कुछ जानकारों का दावा है कि महागठबंधन में कोई औपचारिक घोषणा नहीं होगी. जैसे भाजपा ने पिछली बार जेडीयू के खिलाफ चिराग पासवान को उतारा था, उसी तर्ज पर आरजेडी कांग्रेस के विरुद्ध मुकेश सहनी को रणनीतिक मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर रही है. यह स्थिति विपक्ष की एकजुटता पर प्रश्नचिह्न लगा रही है.
उधर झारखंड मुक्ति मोर्चा भी आरजेडी की ओर देख रहा है. 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में हेमंत सोरेन ने आरजेडी को छह सीटों का सहयोग दिया था, अब बदले में कुछ सीटों की उम्मीद की जा रही है. लेकिन बिहार में तालमेल की यह जटिलता बताती है कि महागठबंधन केवल चुनावी गठजोड़ नहीं, बल्कि अस्तित्व की चुनौती का सामना कर रहा है.
बिहार महागठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर उत्पन्न यह टकराव विपक्षी राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी को उजागर करता है. रणनीतिक एकता का दावा करने वाले दल अब चुनावी जमीनी हकीकत में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिखाई दे रहे हैं. यदि अंतिम क्षणों में समाधान नहीं निकला, तो यह महागठबंधन के लिए राजनीतिक आत्मघात साबित हो सकता है.
इस परिस्थिती में भाजपा और एनडीए को सीधा लाभ मिलना तय है, क्योंकि विपक्ष अपनी ऊर्जा सत्ताधारी गठबंधन का सामना करने के बजाय आंतरिक संघर्ष में खर्च कर रहा है. बिहार का 2025 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं, बल्कि विपक्ष की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया है.