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  • 2026-02-04

Editorial: “मेयर पति” की महात्वाकांक्षा और लोकतंत्र का “रबर स्टैंप” विमर्श

Editorial (Rishabh Rahul): झारखंड के नगर निकाय चुनावों की बिसात बिछते ही प्रदेश की सियासत में एक पुराना लेकिन बेहद दिलचस्प “साइड इफेक्ट” उभर कर सामने आया है. राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा जब से मानगो नगर निगम, जुगसलाई नगर परिषद और अन्य कई निकायों में मेयर व अध्यक्ष पद को महिलाओं के लिए आरक्षित किया गया है, तब से गलियों-चौराहों पर चर्चा का विषय प्रत्याशी नहीं, बल्कि उनके “माननीय पति” बन गए हैं. इसे राजनीति की विडंबना कहें या पुरुष प्रधान समाज की चालाकी, कि पद तो “महिला” के नाम पर आरक्षित हुआ है, लेकिन होड़ “मेयर पति” बनने की मची है.

 “सत्ता की चाबी” मुट्ठी से फिसलने नहीं देना
आधी आबादी के सशक्तिकरण के नाम पर रची गई संवैधानिक व्यवस्था को “पिछवाड़े” से नियंत्रित करने की तैयारी है. मानगो और जुगसलाई जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पोस्टर-बैनर भले ही महिला प्रत्याशियों के नाम के हों, लेकिन उनके पीछे छिपे चेहरों की मुस्कुराहट यह साफ बता रही है कि “सत्ता की चाबी” वे अपनी मुट्ठी से फिसलने नहीं देना चाहते. यह परिदृश्य उस पितृसत्तात्मक सोच की है, जो मानता है कि महिला तो सिर्फ एक “प्रतीक” है, असल हुकूमत तो “साहब” ही करेंगे.

“घूंघट के पीछे से रिमोट कंट्रोल”
जब व्यवस्था ने महिलाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण का द्वार खोला, तो उम्मीद थी कि नए नेतृत्व का उदय होगा. लेकिन वर्तमान होड़ को देखकर ऐसा लगता है जैसे यह चुनाव नगर विकास का नहीं, बल्कि “घूंघट के पीछे से रिमोट कंट्रोल” चलाने का है. कई उम्मीदवार तो अपनी पत्नियों को राजनीति के अखाड़े में ऐसे उतार रहे हैं जैसे वे कोई “पॉलिटिकल प्रॉक्सी” हों. क्या मानगो और जुगसलाई की जनता को एक सशक्त नेतृत्व मिलेगा, या फिर उन्हें “मेयर पति” नामक उस संवैधानिक पद (जो अस्तित्व में ही नहीं है) के दर्शन करने होंगे?

दस्तखत करने वाला हाथ किसी और के दिमाग से होगा संचालित 
जो पुरुष कल तक खुद को स्वयंभू नेता मान रहे थे, आज वे अपनी धर्मपत्नियों की “योग्यता” के गुणगान सिर्फ इसलिए कर रहे हैं ताकि उनकी खुद की सियासी जमीन बंजर न हो जाए. यह स्थिति लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है. यदि निर्णय लेने की शक्ति और फाइल पर दस्तखत करने वाला हाथ किसी और के दिमाग से संचालित होगा, तो आरक्षण का मूल उद्देश्य ही पराजित हो जाएगा.

विकास की फाइलें “साहब” की पसंद और “मेमसाहब” के नाम के बीच ही झूलती रहेंगी?
अंततः, जनता को यह समझना होगा कि उन्हें अपनी समस्याओं के समाधान के लिए एक सक्रिय जनप्रतिनिधि चाहिए, न कि किसी शक्तिशाली व्यक्तित्व की “छाया”. क्या झारखंड के नगर निकाय इस “पति-संस्कृति” से ऊपर उठ पाएंगे, या फिर विकास की फाइलें “साहब” की पसंद और “मेमसाहब” के नाम के बीच ही झूलती रहेंगी? यह सवाल आज मानगो से लेकर जुगसलाई तक हर जागरूक मतदाता की आंखों में तैर रहा है.
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