मर्यादा बनाम कंटेंट, कहाँ खो गई वो निजता
एक समय था जब भारतीय समाज में स्त्री की निजता उसके संस्कारों का अभिन्न हिस्सा थी। वह स्त्री, जो कपड़े बदलते समय दरवाजों की कुंडी बार-बार चेक करती है और अल्ट्रासाउंड या चिकित्सा के समय भी असहजता महसूस करती है, आज उसी समाज का एक हिस्सा कैमरे के सामने अपनी मर्यादा की सीमाओं को लांघ रहा है। प्रश्न यह है कि क्या व्यूज़ की संख्या किसी व्यक्ति के आत्मसम्मान से बड़ी हो गई है
आधुनिकता या मानसिक दासता
आज़ादी का अर्थ कभी भी स्वयं को प्रदर्शन की वस्तु बनाना नहीं था। आधुनिक होने का अर्थ शिक्षा, स्वावलंबन और आत्मबल से आगे बढ़ना है, न कि संकोच और संस्कारों को त्याग देना। टैटू बनवाना व्यक्तिगत चुनाव हो सकता है, लेकिन उसे सार्वजनिक तमाशा बनाना समाज की उस मानसिकता को दर्शाता है जो नग्नता को ही प्रगतिशीलता समझने की भूल कर बैठी है।
समाज की तालियां, पतन को मिलता प्रोत्साहन
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दुखद पहलू वह दर्शक वर्ग है, जो इस तरह के कंटेंट को लाइक और शेयर कर प्रोत्साहित करता है। जब समाज ऐसे पतन पर तालियां बजाता है, तो वह अनजाने में आने वाली पीढ़ी के लिए एक गलत मानक स्थापित कर रहा होता है।
एक विनम्र अपील विचार करें, भविष्य आपका है
हम उस देश के निवासी हैं जहाँ नारी के सम्मान को उसकी सांसों की तरह कीमती माना गया है। आज हमें रुककर खुद से कुछ सवाल करना चाहिए क्या हम अपनी बेटियों को केवल चंद सेकंड के वायरल वीडियो में सिमटते देखना चाहते हैं, क्या डिजिटल लोकप्रियता हमारे वर्षों के संस्कारों से ऊपर है, क्या हम ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जिसके लिए आत्मसम्मान से ज्यादा जरूरी ट्रेंड है।
सम्मान आज भी किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी पूँजी है। हमें यह समझना होगा कि चर्चित होना और सम्मानित होने में जमीन-आसमान का अंतर है। आइए, आधुनिकता की परिभाषा को फिर से परिभाषित करें—जहाँ तकनीक और प्रगति तो हो, लेकिन अपनी जड़ों और मर्यादा की कीमत पर नहीं।