अदालत ने स्पष्ट किया कि जानवरों के व्यवहार का अनुमान लगाना संभव नहीं है और इसलिए संभावित खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सुनवाई के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट के दो न्यायाधीशों के सड़क दुर्घटना में घायल होने का जिक्र भी किया गया, जिससे अदालत ने इस मुद्दे की गंभीरता को रेखांकित किया।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ कर रही है। अदालत की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने बताया कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ने इसके लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार कर ली है और लगभग 1400 किलोमीटर के हाईवे क्षेत्र को जोखिम भरा माना गया है।
पीठ ने याद दिलाया कि 7 नवंबर को ही आदेश दिया जा चुका है कि स्कूलों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों और अन्य सार्वजनिक स्थानों के आसपास से आवारा कुत्तों को हटाकर शेल्टर होम में भेजा जाए। अदालत का मानना है कि सड़कों पर आवारा पशुओं से न केवल काटने की घटनाएं बढ़ रही हैं, बल्कि गंभीर सड़क हादसों का खतरा भी बना रहता है।
दलीलें और जजों की चोट का जिक्र
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने रेलवे परिसरों को भी आदेश के दायरे में शामिल करने की मांग की। उन्होंने कहा कि देशभर में सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर में रखना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है और समाधान क्रूरता के बजाय वैज्ञानिक तरीकों से निकाला जाना चाहिए।
जब सिब्बल ने असम में रेलवे द्वारा इन्फ्रारेड तकनीक के इस्तेमाल का उदाहरण दिया, तो जस्टिस मेहता ने सवाल उठाया कि क्या किसी कुत्ते के व्यवहार या आक्रामकता का अनुमान सुबह-सुबह लगाया जा सकता है। उन्होंने दो टूक कहा कि रोकथाम इलाज से कहीं बेहतर है।
अदालत ने यह भी बताया कि आवारा पशुओं से जुड़ी दुर्घटनाओं में राजस्थान हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश गंभीर रूप से घायल हुए हैं और वे अब भी रीढ़ की हड्डी की चोट से उबर रहे हैं। इसी कारण इस मामले को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
राज्यों की सुस्ती पर नाराजगी, सख्त कदमों के संकेत
सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि कई राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लागू करने में असफल रही हैं। शेल्टर होम और नसबंदी केंद्रों की भारी कमी एक बड़ी समस्या बनकर उभरी है। एमिकस क्यूरी ने बताया कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब जैसे बड़े राज्यों ने अब तक अपना हलफनामा भी दाखिल नहीं किया है।
एनिमल वेलफेयर बोर्ड ने अदालत को बताया कि आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने के लिए पहले नर कुत्तों की नसबंदी पर ध्यान देना जरूरी है। इस पर अदालत ने साफ कहा कि वह केवल यह देख रही है कि नियमों और निर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी है कि जिन राज्यों ने अब भी जवाब नहीं दिया है, उनके खिलाफ अगली सुनवाई में सख्त कार्रवाई की जाएगी।