Jamshedpur: जमशेदपुर से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने बैंकिंग व्यवस्था और मानवता, दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोनारी निवासी सेवानिवृत्त सरकारी शिक्षिका अंजलि बोस (75 वर्ष) की शुक्रवार सुबह एमजीएम अस्पताल में मौत हो गई। उनकी मौत का कारण बीमारी से ज्यादा बैंक प्रबंधन की वह हठधर्मिता और कागजी औपचारिकताएं बनीं, जिन्होंने एक बीमार महिला को उसके अपने ही पैसों के लिए दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया।
आपको बताते है पूरा मामला
अंजलि बोस वर्ष 2008 में कपाली विद्यालय से सेवानिवृत्त हुई थीं। अविवाहित होने के कारण उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI), सोनारी शाखा में जमा कर रखी थी। दुर्भाग्यवश, उनके खाते में कोई नॉमिनी दर्ज नहीं था। पिछले कुछ समय से उनकी तबीयत बिगड़ने लगी और डॉक्टरों ने उन्हें बेहतर इलाज के लिए बड़े अस्पताल में शिफ्ट करने की सलाह दी।
उनकी छोटी बहन गायत्री बोस ने बताया कि बैंक में लाखों रुपए होने के बावजूद, बैंक अधिकारियों ने नियमों का हवाला देकर पैसे देने से इनकार कर दिया। परिजनों ने बैंक के कई चक्कर लगाए, अपनी लाचारी बताई, इलाज की जरूरत का हवाला दिया, लेकिन मैनेजर की हठधर्मिता के आगे उनकी एक न सुनी गई।
उपायुक्त का हस्तक्षेप और देर से जागी बैंक
मामले की गंभीरता को देखते हुए सामाजिक कार्यकर्ता विकास सिंह ने इसकी जानकारी जमशेदपुर के उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी को दी। उपायुक्त ने संवेदनशीलता दिखाते हुए देर रात ही बैंक अधिकारियों और परिजनों से संपर्क किया और मदद के निर्देश दिए।
डीसी के हस्तक्षेप के बाद, बैंक के अधिकारी जो कल तक नियमों का हवाला दे रहे थे, शुक्रवार सुबह 10 बजे हस्ताक्षर लेने एमजीएम अस्पताल पहुंचे। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सुबह 8 बजे ही अंजलि बोस ने दम तोड़ दिया था। अस्पताल पहुंचे अधिकारियों को न केवल परिजनों के भारी आक्रोश का सामना करना पड़ा, बल्कि उन्हें अपनी गलती के लिए माफी भी मांगनी पड़ी।
अब सवाल उठते हैं कि जिम्मेदार कौन है
विकास सिंह ने सीधे तौर पर बैंक प्रबंधन को इस मौत का जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जो प्रक्रिया डीसी के हस्तक्षेप के बाद सुबह 10 बजे अपनाई गई, वह बैंक पहले क्यों नहीं कर सका क्या एक इंसान की जान की कीमत बैंक के प्रोटोकॉल से कम है, जब महिला अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रही थी, तब बैंक मैनेजर ने संवेदनशीलता क्यों नहीं दिखाई, यह प्राकृतिक मृत्यु नहीं, बल्कि सिस्टम द्वारा की गई हत्या है। अगर बैंक ने समय पर पैसे दे दिए होते, तो अंजलि बोस आज किसी बड़े अस्पताल में जीवित होतीं। दोषी अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
विकास सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता
अंजलि बोस की मौत ने यह साफ कर दिया है कि डिजिटल इंडिया और कस्टमर फर्स्ट के दावों के बीच, जमीनी हकीकत आज भी फाइलों और कागजी अड़चनों में दबी हुई है। अब देखना यह है कि प्रशासन उन बैंक अधिकारियों पर क्या कार्रवाई करता है, जिनकी लापरवाही और जिद ने एक सम्मानित शिक्षिका का जीवन छीन लिया।