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  • 2026-01-12

Jharkhand News: 36 महीनों से ठप झारखंड मानवाधिकार आयोग, हजारों पीड़ित अब भी न्याय से दूर

Jharkhand News: झारखंड में मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाई गई संवैधानिक संस्था झारखंड राज्य मानवाधिकार आयोग (JSHRC) पिछले करीब तीन वर्षों यानी 2023 से लगभग निष्क्रिय अवस्था में है. आयोग में न तो अध्यक्ष नियुक्त हैं और न ही सदस्य सचिव. मौजूदा समय में आयोग के नाम पर सिर्फ कुछ कर्मचारी ही काम कर रहे हैं, जिनके पास फैसले लेने या सुनवाई करने का अधिकार नहीं है.
इस स्थिति का सीधा असर आम लोगों पर पड़ रहा है. आयोग के पास इस समय करीब 2,944 मामले लंबित हैं, जिनकी सुनवाई नहीं हो पा रही है.

वर्षों से इंसाफ का इंतजार
राज्य के अलग-अलग जिलों से पुलिस ज्यादती, आदिवासियों के अधिकारों के हनन, महिलाओं और बच्चों के साथ अन्याय तथा अन्य मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामले लगातार आयोग में दर्ज हो रहे हैं.

लेकिन अध्यक्ष और सदस्यों की अनुपस्थिति के कारण न तो मामलों की नियमित सुनवाई हो रही है और न ही सरकार को कोई सिफारिश भेजी जा रही है. अधिकतर शिकायतें केवल दर्ज होकर फाइलों में बंद पड़ी हैं. इससे पीड़ितों को सालों से न्याय का इंतजार करना पड़ रहा है और पूरी मानवाधिकार व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.

अब तक कौन-कौन रहे आयोग के अध्यक्ष
• 2011 में आयोग का गठन हुआ. पहले अध्यक्ष बने सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति नारायण राय, जिनका कार्यकाल पांच वर्ष का रहा.
• इसके बाद मणिपुर के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आर.आर. प्रसाद करीब नौ महीने तक अध्यक्ष रहे.
• फिर राज्यपाल के प्रधान सचिव रहे एस.के. सतपाठी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, जिनका कार्यकाल 5 मार्च 2023 तक रहा.
• 2023 के बाद से आयोग बिना अध्यक्ष और सदस्य सचिव के ही चल रहा है.

आंकड़ों में दिखती आयोग की हालत

   वर्ष            दर्ज        मामले निपटारे 

• 2018        945               91
• 2019        641               20
• 2020        717               78
• 2021        715              252
• 2022        158              112
• 2023         830                0      
• 2024         636                0
• 2025         685                0

आंकड़े साफ बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में मामलों का निपटारा लगभग ठप हो गया है. यदि जल्द ही आयोग में अध्यक्ष और सदस्य सचिव की नियुक्ति नहीं की गई, तो मानवाधिकार संरक्षण की यह अहम संस्था केवल नाम मात्र की रह जाएगी और पीड़ितों की उम्मीदें टूटती चली जाएंगी.
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