Jharkhand News: झारखंड के जंगलों पहाड़ों और गुफाओं में मानवता और पृथ्वी के इतिहास से जुड़े अत्यंत प्राचीन साक्ष्य मौजूद हैं. राज्य के पाषाण और मेगालीथ हजारों वर्षों से उपेक्षा के शिकार रहे हैं जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से सिंहभूम क्षेत्र को पृथ्वी की उन शुरुआती भूभागों में माना जाता है जो करोड़ों वर्ष पहले समुद्र से ऊपर उभरे थे. यह इलाका केवल भौगोलिक पहचान नहीं बल्कि पृथ्वी के जन्म की शुरुआती कथा का हिस्सा माना जाता है.
जीवाश्म वन और शैल चित्रों की अनोखी निरंतरता
झारखंड में जीवाश्मयुक्त वन और प्राचीन भित्ति चित्रों की ऐसी निरंतर परंपरा देखने को मिलती है जो विश्व में दुर्लभ है. यहां प्रागैतिहासिक काल के प्रमाण और आज की जीवित संस्कृति एक ही भूभाग में साथ साथ मौजूद हैं. मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन अपनी प्रस्तावित दावोस और यूनाइटेड किंगडम यात्रा के दौरान इस ऐतिहासिक और वैज्ञानिक सच्चाई को वैश्विक मंच पर रखने की तैयारी में हैं.
मेगालीथ केवल अवशेष नहीं जीवित विरासत
झारखंड के पाषाण किसी भूले हुए अतीत के अवशेष नहीं बल्कि आज भी जीवंत सांस्कृतिक धरोहर हैं. इनमें हजारों वर्षों से चली आ रही परंपराएं खगोल विज्ञान से जुड़ी समझ और मानवीय चेतना झलकती है. दावोस और यूके की आधिकारिक यात्रा के दौरान प्रतिनिधिमंडल इन पाषाणों की वैश्विक महत्ता और सांस्कृतिक निरंतरता को सामने रखेगा ताकि इन्हें अंतरराष्ट्रीय धरोहर के रूप में पहचान मिल सके.
गांवों और जंगलों में सुरक्षित महापाषाणकालीन भू दृश्य
झारखंड के महापाषाणकालीन स्थल किसी दूरस्थ संग्रहालय में नहीं बल्कि सुदूर गांवों और जंगलों में समुदायों के बीच संरक्षित हैं. यह विरासत संरक्षण का ऐसा मॉडल प्रस्तुत करता है जिसमें स्थानीय समाज की भागीदारी अहम भूमिका निभाती है. यह दृष्टिकोण भारत और यूनाइटेड किंगडम के सांस्कृतिक सहयोग और नैतिक संरक्षण की अवधारणा से भी मेल खाता है.
हजारीबाग के मेगालीथ और स्टोनहेंज से समानता
हजारीबाग के पकरी बरवाडीह क्षेत्र में स्थित मेगालीथ सूर्य की गति और इक्वीनौक्स से जुड़े माने जाते हैं. इन संरचनाओं की तुलना यूनाइटेड किंगडम के स्टोनहेंज जैसे प्रतिष्ठित स्थलों से की जाती है. यह समानता बताती है कि अलग अलग महाद्वीपों में मानव ने समय मृत्यु और ब्रह्मांडीय व्यवस्था को पत्थरों के माध्यम से अभिव्यक्त किया. इस्को के शैल चित्र सोहराय और कोहबर पेंटिंग की निरंतर परंपरा और मंडरो के जीवाश्म मिलकर एक दुर्लभ सांस्कृतिक और प्राकृतिक परिदृश्य रचते हैं.
विकास के साथ सांस्कृतिक निरंतरता का संदेश
मुख्यमंत्री के नेतृत्व में झारखंड दावोस और यूनाइटेड किंगडम में आर्थिक विकास के साथ साथ सांस्कृतिक विरासत के महत्व को भी सामने रखेगा. यह संदेश दिया जाएगा कि किसी भी क्षेत्र का दीर्घकालिक विकास बीते समय के सम्मान और सांस्कृतिक निरंतरता पर आधारित होता है. पाषाण युग से लेकर आधुनिक दौर तक झारखंड ने इतिहास और अर्थव्यवस्था दोनों में अपनी भूमिका निभाई है.
संग्रहालयों से बाहर जीवित परंपरा
झारखंड की खासियत यह है कि यहां की विरासत किसी बंद संग्रहालय तक सीमित नहीं है. इस्को के शैल चित्रों से लेकर आज की सोहराय और कोहबर पेंटिंग तक कला और संस्कृति की यह यात्रा हजारों वर्षों से समुदायों के बीच जीवित बनी हुई है.
सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी
यह पहल झारखंड को केवल खनिज और औद्योगिक राज्य के रूप में नहीं बल्कि विश्व सभ्यता के शुरुआती अध्यायों के साक्षी के रूप में प्रस्तुत करती है. यदि यह विरासत वैश्विक मंच पर सही तरीके से रखी जाती है तो न केवल सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी बल्कि पर्यटन अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर भी खुल सकते हैं.