बेटियों के प्रति बदली सोच की मिसाल
अंजुम परवेज उर्फ राजू के घर में करीब 40 साल बाद बेटी की किलकारी गूँजी है। इस खुशी को यादगार बनाने के लिए परिवार ने कोई कसर नहीं छोड़ी। आमतौर पर लोग बेटे के जन्म पर भव्य आयोजन करते हैं, लेकिन राजू ने अपनी नवजात बेटी का स्वागत किसी राजकुमारी की तरह किया।
राजसी ठाट-बाट से हुआ गृह प्रवेश
जब बेटी को अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया, तो नजारा देखने लायक था 12 स्कॉर्पियो का काफिला, बेटी को घर लाने के लिए फूलों से सजी 12 स्कॉर्पियो गाड़ियों का काफिला निकला। डीजे की धुन पर थिरके लोग, सड़कों पर डीजे बज रहा था और परिवार के साथ-साथ मोहल्ले के लोग भी खुशी में झूम रहे थे।
फूलों की बारिश, पूरे रास्ते लाडली पर फूलों की वर्षा की गई, बेटियाँ अल्लाह की रहमत हैं
बेटी के पिता अंजुम परवेज ने भावुक होते हुए कहा, बेटियाँ बोझ नहीं, बल्कि अल्लाह की रहमत होती हैं। हमारे परिवार में लंबे समय से कोई संतान नहीं थी, और इतने सालों बाद बेटी के रूप में जो बरकत मिली है, उसने हमारी जिंदगी मुकम्मल कर दी। हम दुनिया को बताना चाहते थे कि बेटी का आना हमारे लिए सबसे बड़ा उत्सव है।
समाज के लिए एक मजबूत संदेश
बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में, जहाँ आज भी लिंगानुमान और रूढ़िवादी सोच एक चुनौती है, वहां यह पहल एक बड़े बदलाव की आहट है। यह जश्न केवल एक परिवार की खुशी नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो आज भी बेटा-बेटी में फर्क समझते हैं। मौदहा की इन सड़कों पर नाचते-गाते लोगों ने यह साबित कर दिया कि बेटियाँ सिर्फ घर की रौनक ही नहीं, बल्कि गौरव भी होती हैं।