Saraikela: नगर निकाय चुनाव में आरक्षण को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है और अब यह मुद्दा न्यायालय तक पहुंचने लगा है। झारखंड में नगर निकायों के आरक्षण निर्धारण को लेकर उठ रहे सवालों के बीच एक के बाद एक मामले हाईकोर्ट के समक्ष आ रहे हैं। इससे पहले धनबाद नगर निगम के मेयर पद को अनारक्षित किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। इस याचिका पर सुनवाई पूरी होने के बाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की
इसी कड़ी में अब कपाली नगर परिषद के अध्यक्ष पद को अनारक्षित किए जाने का मामला भी झारखंड हाईकोर्ट पहुंच गया है। कपाली निवासी अफशाना परवीन ने इस संबंध में झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की है। इस याचिका का फाइलिंग नंबर WPC/423/2026 है। अफशाना परवीन ने अपनी याचिका में नगर विकास एवं आवास विभाग द्वारा किए गए आरक्षण निर्धारण को नियमों के विपरीत और मनमाना बताया है।
ईडी को भी लिखित शिकायत दी
अफशाना परवीन ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने के साथ-साथ इस कथित अनियमितता को लेकर राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राज्य निर्वाचन आयोग, नगर विकास एवं आवास विभाग के प्रधान सचिव तथा प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को भी लिखित शिकायत दी है। अपनी शिकायत और याचिका में उन्होंने मांग की है कि कपाली नगर परिषद के अध्यक्ष पद के आरक्षण में हुई इस त्रुटि को अविलंब सुधारा जाए, ताकि निष्पक्ष और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत नगर निकाय चुनाव संपन्न कराए जा सकें।
याचिका में अफशाना परवीन ने उल्लेख किया है कि 9 जनवरी 2026 को नगर विकास एवं आवास विभाग द्वारा राज्य की 20 नगर परिषदों के लिए अध्यक्ष पद के आरक्षण की अधिसूचना जारी की गई थी। इस अधिसूचना के तहत कपाली नगर परिषद के अध्यक्ष पद को सामान्य (जनरल) श्रेणी के लिए अनारक्षित कर दिया गया है। जबकि नियमों और उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार यह पद ओबीसी-वन (बीसी-वन) श्रेणी के लिए आरक्षित होना चाहिए था।
नगर परिषद क्षेत्र में बीसी-वन वर्ग की जनसंख्या 59.75 प्रतिशत
उन्होंने अपनी याचिका में यह भी बताया है कि 29 अक्तूबर 2025 को नगर विकास एवं आवास विभाग द्वारा ट्रिपल टेस्ट के आधार पर नगर निकायों की जनसंख्या से संबंधित आंकड़े अधिसूचित किए गए थे। इन आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार कपाली नगर परिषद क्षेत्र में बीसी-वन वर्ग की जनसंख्या 59.75 प्रतिशत है, जो पूरे राज्य में सर्वाधिक बताई गई है। इसके बावजूद कपाली नगर परिषद के अध्यक्ष पद को बीसी-वन के लिए आरक्षित नहीं किया गया।
याचिका में यह भी कहा गया है कि इसके उलट मधुपुर और गोड्डा नगर परिषद के अध्यक्ष पद को बीसी-वन श्रेणी के लिए आरक्षित कर दिया गया है, जबकि वहां बीसी-वन की जनसंख्या कपाली की तुलना में कम है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार मधुपुर नगर परिषद में बीसी-वन की जनसंख्या 56.78 प्रतिशत और गोड्डा नगर परिषद में 53.62 प्रतिशत है। दोनों ही नगर परिषदों में बीसी-वन की आबादी कपाली से कम होने के बावजूद वहां आरक्षण का लाभ दिया गया है।
संवैधानिक प्रावधानों और आरक्षण नीति के भी खिलाफ
अफशाना परवीन ने अपनी याचिका में जोर देकर कहा है कि नगर निकायों में आरक्षण का निर्धारण पूरी तरह जनसंख्या के अनुपात और ट्रिपल टेस्ट के मानकों के आधार पर किया जाना चाहिए। जब जनसंख्या के ये आंकड़े स्वयं राज्य सरकार के नगर विकास एवं आवास विभाग द्वारा अधिसूचित किए गए हैं, तो उन्हीं आंकड़ों को नजरअंदाज कर कपाली नगर परिषद के अध्यक्ष पद को अनारक्षित करना न केवल अनुचित है, बल्कि संवैधानिक प्रावधानों और आरक्षण नीति के भी खिलाफ है।
अब इस मामले के हाईकोर्ट पहुंचने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत नगर विकास एवं आवास विभाग के इस फैसले पर क्या रुख अपनाती है और क्या कपाली नगर परिषद के अध्यक्ष पद के आरक्षण में संशोधन के निर्देश दिए जाते हैं। यह मामला राज्य में नगर निकाय चुनावों के आरक्षण निर्धारण को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल भी बन सकता है।