Explainer: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए नियमों ने उच्च शिक्षा के गलियारों में बहस छेड़ दी है. सरकार जहां इसे बराबरी और भेदभाव खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं कई संगठन इसे सवर्ण विरोधी करार दे रहे हैं. विरोध की आग इतनी तेज है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक शिकायतें पहुंच चुकी हैं. कई राज्यों में प्रदर्शन हो रहे हैं और मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है.
सरकार का दावा क्या कहता है
केंद्र सरकार के मुताबिक नए नियमों का मकसद विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव को जड़ से खत्म करना है. इसके तहत सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता समितियों का गठन अनिवार्य किया गया है. सरकार का कहना है कि इससे पिछड़े और वंचित वर्ग के छात्रों की शिकायतों का समय पर समाधान होगा और कैंपस में समावेशी माहौल बनेगा.
सवर्ण विरोध का आरोप क्यों लग रहा है
इन नियमों के सामने आते ही कई सामाजिक संगठनों ने नाराजगी जाहिर की. उनका कहना है कि समानता के नाम पर सवर्ण वर्ग के छात्रों के शैक्षणिक अधिकार कमजोर किए जा रहे हैं. राष्ट्रपति को भेजे गए ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि ये नियम संविधान की भावना के खिलाफ हैं और सामाजिक संतुलन को बिगाड़ सकते हैं.
विरोध करने वालों के तर्क
विरोधी संगठनों का मानना है कि यह फैसला उच्च शिक्षा में वर्षों से चले आ रहे सामाजिक न्याय के ढांचे को प्रभावित करेगा. कुछ लोग इसे राजनीतिक एजेंडे से जोड़कर देख रहे हैं और इसे पॉलिटिकल स्टंट भी बता रहे हैं. हालांकि सरकार की ओर से इस पर किसी बदलाव का संकेत फिलहाल नहीं दिया गया है.
क्या हैं UGC के नए नियम
यूजीसी के नए प्रावधानों के तहत हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में समान अवसर केंद्र यानी EOC बनाना जरूरी होगा. इन समितियों में ओबीसी, एससी, एसटी, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया है. यह केंद्र वंचित वर्गों से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन पर नजर रखेगा और छात्रों को शैक्षणिक व सामाजिक मार्गदर्शन देगा.
EOC को क्या जिम्मेदारी दी गई है
नियमों के अनुसार EOC का काम कैंपस में विविधता और समानता को बढ़ावा देना होगा. अगर किसी कॉलेज में समिति के लिए पर्याप्त सदस्य नहीं हैं तो उससे जुड़ी यूनिवर्सिटी यह जिम्मेदारी संभालेगी. यह केंद्र नागरिक समाज, प्रशासन, पुलिस, मीडिया और गैर सरकारी संगठनों के साथ समन्वय भी करेगा. जरूरत पड़ने पर कानूनी सहायता के लिए विधिक सेवा प्राधिकरणों से भी संपर्क किया जाएगा.
इक्विटी एंबेसडर और ऑनलाइन पोर्टल
शिकायतों के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाना अनिवार्य किया गया है. समितियों को साल में कम से कम दो बार बैठक और रिपोर्ट जारी करनी होगी. हॉस्टल और विभागों में इक्विटी एंबेसडर तैनात किए जाएंगे. शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर समिति को बैठक करनी होगी और तय समय में कार्रवाई करनी होगी. नियम न मानने वाले संस्थानों को यूजीसी योजनाओं से वंचित किया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट से कैसे जुड़ा है मामला
इन नियमों की पृष्ठभूमि सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने निर्देश से जुड़ी है. रोहित वेमुला और पायल ताडवी की माताओं की याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने यूजीसी को नए नियम लाने को कहा था. फरवरी 2025 में इसका मसौदा सार्वजनिक किया गया और 13 जनवरी को अधिसूचना जारी हुई.
क्यों रद्द करने की मांग उठी
सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका में नियमों की धारा 3 (सी) को मनमाना और असंवैधानिक बताया गया है. याचिकाकर्ता का कहना है कि यह प्रावधान समानता के नाम पर सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव बढ़ा सकता है और कुछ छात्रों को शिक्षा से दूर कर सकता है.
UGC के नए नियम शिक्षा में समानता लाने की कोशिश हैं लेकिन समाज के एक बड़े हिस्से में यह आशंका भी गहरी है कि इससे नया असंतुलन पैदा हो सकता है. सरकार और विरोधी संगठनों के बीच टकराव ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे दिया है. अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही तय करेगा कि ये नियम उच्च शिक्षा में सुधार का रास्ता खोलेंगे या विवाद की नई लकीर खींचेंगे.