National News: NEET-PG में दाखिले के लिए धर्म परिवर्तन के दावे ने सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस खड़ी कर दी है. सामान्य वर्ग से जुड़े दो उम्मीदवारों के बौध धर्म अपनाने के दावे पर शीर्ष अदालत ने इसे अल्पसंख्यक अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला मानते हुए हरियाणा सरकार से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है.
सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों की याचिका पर सुनवाई
यह मामला निखिल कुमार पुनिया और एकता से जुड़ा है, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दावा किया कि उन्होंने बौध धर्म स्वीकार कर लिया है. याचिका में मांग की गई थी कि उत्तर प्रदेश के सुभारती मेडिकल कॉलेज में उन्हें बौधिस्ट कोटे के तहत NEET-PG में एडमिशन दिया जाए. इस याचिका पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई की.
कोर्ट के सवालों से खुली धर्म परिवर्तन की परत
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता निखिल कुमार पुनिया की जाति को लेकर सवाल उठाया. कोर्ट ने कहा कि पुनिया या तो अनुसूचित जाति में आते हैं या जाट समुदाय से हो सकते हैं. इस पर याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि वे जाट हैं. इसके बाद अदालत ने पूछा कि जाट होने के बावजूद अल्पसंख्यक का दावा कैसे किया जा सकता है.
धर्म परिवर्तन के दावे पर सख्त टिप्पणी
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि उन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है और वे अब बौधिस्ट हैं. इस दलील पर मुख्य न्यायाधीश ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और इसे धोखाधड़ी का तरीका बताया. अदालत ने कहा कि इस तरह के प्रयास वास्तविक अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों को नुकसान पहुंचाते हैं. कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि NEET-PG परीक्षा के दौरान याचिकाकर्ताओं ने खुद को सामान्य वर्ग का ही बताया था.
हरियाणा सरकार से मांगी गई रिपोर्ट
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के मुख्य सचिव को दो सप्ताह में रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. रिपोर्ट में यह स्पष्ट करना होगा कि अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी करने के लिए क्या दिशा निर्देश हैं. इसके साथ ही यह भी बताना होगा कि NEET-PG में सामान्य वर्ग घोषित करने के बाद क्या किसी को बौध अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जा सकता है.
प्रमाण पत्र जारी करने पर भी सवाल
अदालत ने यह जानना चाहा है कि यदि नियम इसकी अनुमति नहीं देते हैं, तो फिर एसडीओ द्वारा बौध अल्पसंख्यक होने का प्रमाण पत्र किस आधार पर जारी किया गया. इस बिंदु पर कोर्ट ने राज्य प्रशासन की भूमिका को भी जांच के दायरे में रखा है.
यह मामला केवल एक एडमिशन विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे अल्पसंख्यक आरक्षण और धर्म परिवर्तन के दुरुपयोग से जुड़े बड़े सवाल सामने आए हैं. सुप्रीम कोर्ट की सख्ती यह संकेत देती है कि योग्यता और संवैधानिक अधिकारों के संतुलन से किसी भी तरह की छेड़छाड़ को अदालत गंभीरता से ले रही है. आने वाली रिपोर्ट के बाद इस पूरे विवाद की दिशा और स्पष्ट होने की संभावना है.