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  • 2026-02-07

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट की कड़ी फटकार, मैट्रिक परीक्षार्थी को 10 दिनों तक अवैध हिरासत में रखने पर चतरा पुलिस घेरे में, अफसरों के मोबाइल हुए जब्त

Jharkhand: झारखंड उच्च न्यायालय ने चतरा जिले की पुलिस द्वारा एक 19 वर्षीय मैट्रिक परीक्षार्थी को 10 दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखने के मामले पर बेहद तल्ख टिप्पणी की है। अदालत ने पुलिस की इस कार्रवाई को न केवल कानून का उल्लंघन माना, बल्कि छात्र का भविष्य खराब करने के लिए पुलिस अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए चतरा डीएसपी और दो थाना प्रभारियों के मोबाइल फोन तक कोर्ट में जब्त करवा लिए।

खंडपीठ ने पहले सत्र की सुनवाई 

खंडपीठ ने पहले सत्र की सुनवाई के दौरान चतरा डीएसपी और लावालौंग व टंडवा थाना प्रभारी के मौजूद रहने पर भी सवाल उठाया. खंडपीठ ने पूछा कि उपस्थित होने के लिए तो नहीं कहा गया था, तो क्यों आये. जब आये हैं, तो केस डायरी क्यों नहीं लाये. खंडपीठ ने तीनों अफसरों से पूछा कि 26-27 जनवरी की रात्रि दो बजे बच्चे को घर से क्यों उठाया ? पूछताछ के बाद बच्चे को तुरंत क्यों नहीं छोड़ा गया? क्यों 10 दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया ?

रात दो बजे घर से पुलिस ने उठाया था छात्र को, याचिका दायर होने पर घर पहुंचाया

रंगदारी के मामले में बच्चे के मोबाइल को संदिग्ध बताते हुए लावालौंग थाना पुलिस ने 26 जनवरी की रात दो बजे मैट्रिक परीक्षा की तैयारी कर रहे बच्चे को उठा लिया था. पूछताछ के बाद भी पुलिस ने बच्चे को नहीं छोड़ा और उसे टंडवा थाना को सौंप दिया. पुलिस ने 10 दिनों तक उसे अवैध रूप से रखा. जब हाइकोर्ट में हेवियस कॉर्पस याचिका दायर हो गयी, तो बच्चे को पुलिस ने घर पहुंचा दिया, लेकिन पुलिसकर्मी उसके घर के पास तैनात हैं. वह हाइकोर्ट से केस वापस लेने का दबाव बना रहे हैं. पुलिस द्वारा किसी को हिरासत में लिये जाने के बाद उसे 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया. प्रार्थी ने अपनी याचिका में कहा है कि अवैध हिरासत में रखे जाने से बच्चे की मैट्रिक परीक्षा छूट रही है.


खंडपीठ ने कहा कि टंडवा थाना में कांड संख्या-26/2026 के तहत मामला दर्ज था. संबंधित मामले में पूछताछ के लिए हिरासत में रखा गया था, तो क्या उसका उल्लेख केस डायरी में है. इस पर डीएसपी की ओर से बताया गया कि स्टेशन डायरी में इस संबंध में लिखा गया है. इसके बाद खंडपीठ ने चतरा एसपी को फोन लगवाया. उनसे केस डायरी के बारे में पूछा. खंडपीठ ने एसपी से पूछा कि क्या केस डायरी में इस बच्चे को हिरासत में लेकर पूछताछ के संबंध में कोई बात लिखी गयी है अथवा नहीं, नाराज खंडपीठ ने चतरा डीएसपी, टंडवा व लावालौंग थाना प्रभारी का मोबाइल फोन सीज करते हुए उन्हें कोर्ट में बैठने का निर्देश दिया तथा दोपहर एक बजे सुनवाई के लिए समय निर्धारित किया. चतरा एसपी को केस डायरी के साथ वर्चुअल उपस्थित होने का निर्देश दिया. दोपहर एक बजे फिर सुनवाई शुरू हुई. इस दौरान चतरा एसपी कोर्ट से मोबाइल फोन पर वर्चुअल उपस्थित हुए. मामले से संबंधित केस डायरी को एसपी ने पढ़ कर सुनाया.

 कानून और छात्र का भविष्य

केस डायरी में बच्चे से 27 एवं 30 जनवरी को हुई पूछताछ के बारे में जिक्र है. अगली सुनवाई के दौरान मामले के अनुसंधानकर्ता को केस डायरी पेश करने का निर्देश दिया. खंडपीठ ने डीएसपी और टंडवा व लावालीग थाना प्रभारी के जब्त मोबाइल लौटा दिये तथा अगली सुनवाई में सशरीर उपस्थित रहने का निर्देश दिया. अगली सुनवाई के लिए 13 फरवरी की तिथि निर्धारित की गयी. इससे पूर्व प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता विपिन बिहारी, अधिवक्ता भास्कर त्रिवेदी व अधिवक्ता प्रियांश निलेश ने पक्ष रखा. वहीं राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता सचिन कुमार ने पैरवी की. ज्ञात हो कि प्राथी बच्चे की मां ने हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की है.

 न्याय और नागरिक अधिकारों के प्रति सजग रहें

चतरा की यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कानून की रक्षा के लिए जिम्मेदार संस्थाएं जब खुद मर्यादा लांघती हैं, तो एक आम नागरिक और खासकर एक छात्र के भविष्य पर क्या गुजरती है। एक 19 वर्षीय छात्र की मैट्रिक की परीक्षा सिर्फ इसलिए छूट गई क्योंकि पुलिस ने प्रक्रिया का पालन करना जरूरी नहीं समझा।

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