यह उन बेटियों की राहत थी, जो विदाई के नाम से ही भावुक हो जाती थीं। और यह उस समाज की तस्वीर थी, जो एक दिन के लिए ही सही, सच में साथ खड़ा दिखा।सुबह होते ही फुटबॉल मैदान पर चहल-पहल शुरू हो गई। दूल्हे सजे-धजे, चेहरे पर हल्की घबराहट और बड़ी सी मुस्कान। कहीं मां आखिरी बार बेटे की पगड़ी ठीक कर रही थी, तो कहीं पिता चुपचाप खड़े होकर बस देख रहे थे। बारात निकली तो ढोल-नगाड़ों की आवाज़ के साथ पूरा इलाका गूंज उठा।
बीएमडब्ल्यू, थार और दूसरी गाड़ियों में बैठे दूल्हों को देखकर लोग रुक-रुककर मोबाइल से तस्वीरें लेने लगे। लेकिन इन चमकती गाड़ियों से ज्यादा चमक उन आंखों में थी, जिनमें सम्मान का एहसास था।बारात में शामिल एक बुजुर्ग पिता ने धीमी आवाज़ में कहा, “सोचा नहीं था कि बेटी की शादी इतने लोगों के बीच, इतने सम्मान के साथ होगी।” उनकी आंखें भीगी थीं, लेकिन चेहरे पर संतोष साफ झलक रहा था। ऐसी ही कहानी कई परिवारों की थी। किसी ने कर्ज के डर से बेटी की शादी टाल रखी थी, तो कोई हालात से हार मान चुका था। आज उन सबके लिए यह दिन उम्मीद की तरह आया।जैसे ही 101 जोड़े मंच पर पहुंचे, पूरा मैदान तालियों से भर गया। सितारा आकृति में हुई जयमाला ने हर किसी को कुछ पल के लिए रोक दिया। आतिशबाजी, पोपर्स और लोकवाद्य के बीच ऐसा लग रहा था मानो खुशी खुद नाच रही हो। छऊ नृत्य, झूमर और पारंपरिक गीतों ने माहौल को और गहरा बना दिया।
यह शोर नहीं था, यह जश्न था।सबसे भावुक पल तब आया, जब कन्यादान की रस्म शुरू हुई। मां-बाप की हथेलियां कांप रही थीं। बेटियां आंसू पोंछते हुए मुस्कुराने की कोशिश कर रही थीं। सांसद मनीष जायसवाल भी इस दौरान खुद को संभालते दिखे। उन्होंने बेटियों से कहा कि वे उन्हें अपने भाई और बेटे की तरह याद कर सकती हैं। यह बात मंच से उतरी नहीं, सीधे दिलों में गई।इन 101 जोड़ों में कई दिव्यांग और बेहद जरूरतमंद थे। उनके लिए शादी के साथ जीवन की चिंता भी थी। इसी वजह से उन्हें इलेक्ट्रिक रिक्शा, गृहस्थी का सामान और रोजमर्रा की जरूरत की चीजें दी गईं। एक नवविवाहित युवक ने कहा, “अब लग रहा है कि हम भी अपने पैरों पर खड़े हो पाएंगे।” उसकी बात में कृतज्ञता नहीं, आत्मविश्वास था।
कोलकाता से आए पंडितों ने मंत्रों को आसान शब्दों में समझाया
कोलकाता से आए पंडितों ने मंत्रों को आसान शब्दों में समझाया। शहनाई की धुन और विवाह गीतों ने माहौल को सुकून भरा बना दिया। मुख्य मंच से मनोज तिवारी के गीतों ने लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया, तो दीपक तिर्की के लोकगीतों ने झारखंड की मिट्टी की खुशबू बिखेर दी।करीब एक लाख लोग, फिर भी कोई अफरा-तफरी नहीं। पुलिस, स्वयंसेवक और आयोजक सब एक-दूसरे के साथ तालमेल में दिखे। खाना, पानी, बैठने की व्यवस्था, सब कुछ सोच-समझकर किया गया था।
शादी सिर्फ रस्म नहीं रहती, वह भरोसा बन जाती
यह आयोजन किसी एक व्यक्ति का नहीं था। इसमें सैकड़ों हाथ जुड़े हुए थे।कार्यक्रम के अंत में सांसद मनीष जायसवाल ने कहा कि अगर समाज आगे आए, तो कोई भी बेटी बोझ नहीं बनती। उसकी शादी सम्मान से हो सकती है। शाम ढलते-ढलते जब बेटियां विदा हो रही थीं, तो मैदान में एक अजीब सा सन्नाटा था। लोग मुस्कुरा रहे थे, लेकिन आंखें नम थीं। रामगढ़ ने उस दिन देखा कि जब संवेदना साथ चलती है, तो शादी सिर्फ रस्म नहीं रहती, वह भरोसा बन जाती है।