Jharkhand News: सुप्रीम कोर्ट ने देश के विभिन्न राज्यों में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के मामलों के निपटारे में हो रही देरी पर कड़ा रुख अपनाया है. न्यायालय ने उन 17 राज्यों को नोटिस जारी किया है जहां एनआईए के विशेष न्यायालयों में 10 से अधिक मामले लंबित पड़े हैं. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्यों से स्थिति रिपोर्ट तलब की है.
जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई हकीकत
यह मामला तब प्रकाश में आया जब हिदायतुल्ला नामक एक व्यक्ति ने निचली अदालत से जमानत याचिका खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी. इस अपील की सुनवाई के दौरान पीठ को अवगत कराया गया कि राज्यों में एनआईए के लिए गठित विशेष अदालतों में मुकदमों का भारी बोझ है, जिसके कारण सुनवाई में लंबा समय लग रहा है. इस जानकारी को गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और उन सभी राज्यों को प्रतिवादी बना दिया जहां लंबित मामलों की संख्या दहाई का आंकड़ा पार कर चुकी है.
दिल्ली में सर्वाधिक मामले लंबित, इन राज्यों को मिला नोटिस
न्यायालय द्वारा की गई समीक्षा में यह तथ्य सामने आया कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सबसे अधिक 59 एनआईए मामले लंबित हैं. इसके अलावा झारखंड, बिहार, असम, छत्तीसगढ़, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, मणिपुर, पंजाब, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना जैसे 17 राज्यों को नोटिस जारी किया गया है. इन राज्यों को अब अपने यहां गठित विशेष न्यायालयों की वर्तमान स्थिति और मामलों के लंबित रहने के ठोस कारणों पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करनी होगी.
राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों की जांच करने वाली एजेंसी एनआईए के मुकदमों में देरी होना न्याय व्यवस्था और सुरक्षा दोनों के लिहाज से चिंताजनक है. सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान लेना यह दर्शाता है कि त्वरित सुनवाई का अधिकार अभियुक्त और राष्ट्र दोनों के लिए महत्वपूर्ण है. विशेष अदालतों की कमी या अपर्याप्त संसाधनों के कारण आतंकवाद और संगठित अपराध जैसे गंभीर मामलों का वर्षों तक खिंचना न्याय की मूल भावना को प्रभावित करता है. झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में, जो नक्सलवाद और आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों से जूझ रहे हैं, वहां त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक है. राज्यों की आगामी रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो पाएगा कि इन देरी के पीछे न्यायिक ढांचागत कमियां हैं या प्रशासनिक प्रक्रियात्मक बाधाएं.