झारखंड निकाय चुनाव: अधूरे वादे और “बिड़बल की खिचड़ी” बना विकास
झारखंड में नगर निकाय चुनाव का बिगुल फुंक चुका है, लेकिन मानगो, जुगसलाई और आदित्यपुर जैसे क्षेत्रों में जमीनी हकीकत दावों से कोसों दूर है. मानगो में पहली बार नगर निगम के चुनाव हो रहे हैं, लेकिन बुनियादी ढांचे का अभाव चुनावी चर्चा का मुख्य केंद्र है. सबसे बदतर स्थिति आदित्यपुर नगर निगम की है, जहां पिछले पांच वर्षों में सीवरेज और ड्रेनेज जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं भ्रष्टाचार और लेटलतीफी की भेंट चढ़ गई हैं.
आदित्यपुर की जनता का आरोप है कि पाइपलाइन तो बिछा दी गई, लेकिन पानी की टंकियां पिछले पांच साल से “बिड़बल की खिचड़ी” की तरह निर्माणाधीन ही हैं. कपाली नगर परिषद की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है. विडंबना यह है कि इस बार भी अधिकांश प्रत्याशी वही पुराने चेहरे हैं, जिन्होंने पिछली बार जनता से वादे तो किए थे लेकिन उन्हें पूरा करने में विफल रहे. अब सवाल यह है कि जो नेता पांच साल में अपना काम पूरा नहीं कर सके, उन पर जनता दोबारा भरोसा कैसे करे?
संसद में गूंजी “राइट टू रिकॉल” की मांग: "हायर किया है तो फायर भी करेंगे"
ठीक इसी समय, राज्यसभा में बजट सत्र के दौरान आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने एक ऐसी मांग रखी है जो सीधे तौर पर झारखंड के इन बदहाल निकायों की समस्याओं का समाधान नजर आती है. राघव चड्ढा ने केंद्र सरकार से मांग की है कि भारतीय मतदाताओं को “राइट टू रिकॉल” (वापस बुलाने का अधिकार) मिलना चाहिए.
उन्होंने तर्क दिया कि यदि मतदाता अपने जनप्रतिनिधि को चुन (Hire) सकते हैं, तो काम न करने की स्थिति में उन्हें हटाने (Fire) की शक्ति भी उनके पास होनी चाहिए. चड्ढा ने कहा, "ऐसा कोई पेशा नहीं है जहां आप पांच साल तक खराब प्रदर्शन करें और आपको कोई परिणाम न भुगतना पड़े. फिर राजनीति में ऐसा क्यों?" उन्होंने अमेरिका और स्विट्जरलैंड जैसे देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि हम राष्ट्रपति या जजों को हटा सकते हैं, तो एक असफल विधायक या सांसद को क्यों नहीं?
वादे और जवाबदेही के बीच फंसा मतदाता
झारखंड के निकाय चुनाव और संसद की यह बहस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. आदित्यपुर और मानगो जैसे क्षेत्रों में जनता इसलिए ठगा हुआ महसूस कर रही है क्योंकि चुनाव जीतने के बाद नेताओं की जवाबदेही खत्म हो जाती है. “राइट टू रिकॉल” जैसा कानून ऐसे जनप्रतिनिधियों के लिए एक “डिटेरेंट” (अवरोधक) का काम कर सकता है जो विकास योजनाओं को “बिड़बल की खिचड़ी” बनाकर छोड़ देते हैं.
जब तक मतदाताओं के पास चुनाव के बीच में अपने प्रतिनिधियों को दंडित करने का कोई वैधानिक रास्ता नहीं होगा, तब तक भ्रष्टाचार और अधूरे प्रोजेक्ट्स की यह कहानी हर पांच साल में दोहराई जाती रहेगी. राघव चड्ढा की मांग भले ही भविष्य की बात लगे, लेकिन झारखंड के मौजूदा निकाय चुनाव में जनता का आक्रोश इस मांग की तात्कालिक प्रासंगिकता को सिद्ध करता है.