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  • 2026-02-17

Ranchi News: सदर अस्पताल रांची में होगी बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सुविधा, स्वास्थ्य विभाग ने जारी किए 6 करोड़ रुपये

Ranchi News: सदर अस्पताल जल्द ही राज्य का पहला ऐसा सरकारी चिकित्सा संस्थान बनेगा, जहां मरीजों को बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध होगी. स्वास्थ्य विभाग ने इस विशेष यूनिट की स्थापना के लिए 6 करोड़ रुपये की राशि आवंटित कर दी है. यह कदम सिकल सेल, थैलेसीमिया और ब्लड कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए जीवनदान साबित होगा. विशेष रूप से झारखंड के जनजातीय समुदायों में इन बीमारियों के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए यह पहल काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन से मिलेगी मुक्ति
सिकल सेल और थैलेसीमिया से पीड़ित मरीजों को वर्तमान में बार-बार खून चढ़ाने (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) की जरूरत पड़ती है, जो न केवल कष्टदायक है बल्कि आर्थिक रूप से भी बोझिल होता है. अस्पताल के विशेषज्ञों के अनुसार, बोन मैरो ट्रांसप्लांट इन बीमारियों का स्थायी समाधान है. इस सुविधा के शुरू होने से मरीजों को जीवनभर खून चढ़ाने की झंझट से मुक्ति मिल सकेगी और वे पूरी तरह स्वस्थ जीवन व्यतीत कर पाएंगे.

नई बिल्डिंग के आठवें फ्लोर पर तैयार होगा विंग
अस्पताल प्रबंधन ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट के लिए सदर अस्पताल की नई बिल्डिंग के आठवें तल्ले पर जगह चिन्हित कर ली है. वर्तमान में डॉ. अभिषेक रंजन के नेतृत्व में 40 बेड का डे केयर सेंटर संचालित हो रहा है, जहां प्रतिदिन लगभग 30 मरीजों का ब्लड ट्रांसफ्यूजन किया जाता है. नई यूनिट स्थापित होने के बाद जटिल सर्जरी और ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया भी यहीं संपन्न हो सकेगी.

विशेषज्ञों की टीम और अत्याधुनिक उपकरण
सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार ने बताया कि यूनिट को नवीनतम चिकित्सा उपकरणों से लैस किया जाएगा. गुणवत्तापूर्ण इलाज के लिए विशेषज्ञों की एक विशेष टीम तैयार की जा रही है. फिलहाल एक विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध हैं और बाहर के कई अन्य डॉक्टर भी यहां अपनी सेवाएं देने के लिए तैयार हैं. सरकार जल्द ही अन्य आवश्यक पदों पर नियुक्तियां करेगी ताकि किसी भी स्तर पर इलाज में बाधा न आए.

सदर अस्पताल में बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सुविधा शुरू होना झारखंड की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक बड़ी उपलब्धि है. निजी अस्पतालों में इस प्रक्रिया का खर्च लाखों में होता है, जो गरीब मरीजों की पहुंच से बाहर है. राजधानी के सरकारी अस्पताल में यह सुविधा मिलने से न केवल मरीजों का दूसरे राज्यों में पलायन रुकेगा, बल्कि आदिवासी बहुल इलाकों में वंशानुगत रक्त रोगों के खिलाफ लड़ाई को नई ताकत मिलेगी. अब चुनौती इस उच्च-तकनीकी सुविधा के सफल संचालन और रखरखाव की होगी.
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