Maharashtra: महाराष्ट्र की राजनीति में मंगलवार देर रात एक बड़े घटनाक्रम ने हलचल मचा दी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार ने मुस्लिम समुदाय को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मिलने वाले 5% आरक्षण के पुराने संकल्प को आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिया है। सामाजिक न्याय विभाग द्वारा जारी इस नए आदेश के बाद अब मुस्लिम समुदाय के लोग इस कोटे के आधार पर आरक्षण का दावा नहीं कर सकेंगे।
बताते है क्या है नया सरकारी आदेश
17 फरवरी की रात जारी किए गए सरकारी संकल्प (जीआर) के अनुसार, राज्य सरकार ने उन पुराने प्रावधानों को पूरी तरह समाप्त कर दिया है जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण देने की बात कही गई थी। सरकार का तर्क है कि यह आदेश कानूनी और तकनीकी रूप से लंबे समय से अधर में था, जिसे अब स्पष्टता देने के लिए औपचारिक रूप से निरस्त कर दिया गया है।
विवाद और कानूनी पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा महाराष्ट्र में पिछले एक दशक से कानूनी पेचीदगियों में फंसा हुआ था। 2014 का अध्यादेश, तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने चुनाव से ठीक पहले एक अध्यादेश के जरिए मुस्लिमों को 5% आरक्षण दिया था। हाईकोर्ट का रुख, बॉम्बे हाईकोर्ट ने नौकरियों में आरक्षण पर रोक लगा दी थी, लेकिन शिक्षा में 5% कोटे को अनुमति दी थी। समय सीमा, चूंकि बाद की सरकारों ने इस अध्यादेश को कानून में बदलने के लिए समय पर कदम नहीं उठाए, इसलिए तकनीकी रूप से यह काफी पहले ही अमान्य हो गया था।
राजनीतिक गलियारों में हलचल
विपक्ष ने इस कदम को चुनावी ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यक विरोधी करार दिया है। वहीं, सत्ता पक्ष का कहना है कि यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया है ताकि पुराने और निष्प्रभावी हो चुके आदेशों के कारण पैदा होने वाले भ्रम को दूर किया जा सके। इस फैसले के बाद राज्य में एक बार फिर आरक्षण की सीमा और संवैधानिक प्रावधानों को लेकर बहस छिड़ गई है। जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा सड़क से लेकर सदन तक गर्मा सकता है।