Jharkhand News: झारखंड में भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम चलाने वाली एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की कार्यशैली पर अब सवाल उठने लगे हैं. जिन हाई-प्रोफाइल मामलों में शुरुआती दौर में भारी सक्रियता दिखाई गई थी, उनकी जांच अब ठंडी पड़ती नजर आ रही है. विशेष रूप से राज्य के चर्चित शराब घोटाले में कार्रवाई की गति काफी धीमी हो गई है, जबकि इस मामले के कई प्रभावशाली आरोपी एक-एक कर न्यायिक हिरासत से बाहर आ चुके हैं.
विनय चौबे के डीए केस पर एसीबी का ध्यान
एसीबी के विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसी ने फिलहाल अपना पूरा ध्यान निलंबित आईएएस विनय कुमार चौबे और उनके परिजनों के विरुद्ध दर्ज आय से अधिक संपत्ति (डीए) के मामले पर लगा दिया है. इस केस से जुड़े दस्तावेजों, बैंक ट्रांजेक्शन और चल-अचल संपत्तियों की ऑडिटिंग का काम अपने अंतिम चरण में है. विभाग इस ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर जल्द ही कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करने की योजना बना रहा है. माना जा रहा है कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद इस मामले में कई नए तथ्य सामने आ सकते हैं.
रसूखदारों को राहत, केवल मुख्य आरोपी हिरासत में
वर्तमान स्थिति यह है कि जमीन घोटाले के मुख्य आरोपी और खरीदार विनय सिंह को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल चुकी है, जबकि उनकी पत्नी स्निग्धा सिंह के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर फिलहाल रोक है. इस पूरे प्रकरण में शामिल बड़े नामों में से अब केवल निलंबित आईएएस विनय कुमार चौबे ही जेल में हैं. उन्होंने भी अपनी जमानत के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है, जिस पर आने वाले दिनों में फैसला होने की उम्मीद है.
क्या है आय से अधिक संपत्ति का प्रकरण
एसीबी ने 24 नवंबर 2025 को विनय कुमार चौबे, उनकी पत्नी, ससुर और साले सहित सहयोगी विनय सिंह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी. आरोप है कि पद का दुरुपयोग कर करोड़ों रुपये की अवैध संपत्ति बनाई गई और इस काली कमाई को रिश्तेदारों के नाम पर संपत्तियों और शेल कंपनियों में निवेश किया गया. जांच एजेंसी का दावा है कि सहयोगी विनय सिंह की कंपनी नेक्सजेन ऑटोमोबाइल के जरिए अवैध धन को ठिकाने लगाने की कोशिश की गई थी. अब राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि क्या एसीबी इस मामले को किसी तार्किक परिणति तक पहुंचा पाएगी या यह केवल फाइलों तक सीमित रह जाएगा.
एसीबी की जांच के केंद्र में बदलाव यह संकेत देता है कि एजेंसी अब उन मामलों पर अधिक जोर दे रही है जहां दस्तावेजी साक्ष्य (जैसे ऑडिट और बैंक ट्रांजेक्शन) अधिक पुख्ता हैं. शराब घोटाले जैसी बड़ी साजिशों में अक्सर गवाहों और कड़ियों को जोड़ना चुनौतीपूर्ण होता है, जिसके कारण जांच सुस्त पड़ जाती है. हालांकि, बड़े आरोपियों का जेल से बाहर आना और केवल एक अधिकारी का हिरासत में रहना जांच एजेंसी की विश्वसनीयता पर दबाव पैदा करता है. आने वाली चार्जशीट ही तय करेगी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ यह लड़ाई कितनी प्रभावी साबित होगी.