Jharkhand News: झारखंड में मॉब लिंचिंग यानी भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा एक नासूर बनती जा रही है. कभी बच्चा चोरी का शक, तो कभी डायन-बिसाही का अंधविश्वास, मासूम जिंदगियों पर भारी पड़ रहा है. पिछले पांच वर्षों के आंकड़े डराने वाले हैं, जहां 10 से अधिक लोगों को भीड़ ने पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया. पुलिस ने इन मामलों में अब तक 105 से अधिक आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजा है, लेकिन जमीनी स्तर पर खौफ का यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा.
अफवाहों का बाजार और जान की कीमत
इन घटनाओं के पीछे सबसे बड़ी वजह व्हाट्सएप पर फैलने वाली बच्चा चोरी की फर्जी खबरें और ग्रामीण इलाकों में पसरा अंधविश्वास है. कई मामलों में तो मौत के बाद पता चला कि मरने वाला बेकसूर था. हालिया घटनाओं पर नजर डालें तो दिल दहल जाता है:
- चतरा (17 फरवरी 2025): बच्चा चोरी के शक में एक व्यक्ति की जान ले ली गई.
- लातेहार (9 मार्च 2025): बकरी चोरी के आरोप में एक मजदूर को मार डाला गया.
- रांची (17 जनवरी 2026): चोरी के संदेह में एक युवक भीड़ की सनक का शिकार हुआ.
- गोड्डा और बोकारो में भी मवेशी चोरी और अन्य आरोपों में लोगों को पीट-पीटकर मार दिया गया.
कानून बना, पर कागजों से बाहर नहीं निकला
मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए झारखंड सरकार ने साल 2021 में “झारखंड मॉब लिंचिंग निषेध विधेयक” पारित किया था. इसमें दोषियों को उम्रकैद और भारी जुर्माने जैसे कड़े प्रावधान रखे गए थे. उद्देश्य था कि एक ऐसा सख्त कानून बने जिससे भीड़ हिंसा करने से डरे, लेकिन विडंबना यह है कि यह विधेयक अब तक पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है. प्रभावी कानून के अभाव में अपराधी अक्सर बच निकलते हैं या कानूनी प्रक्रिया लंबी खिंचती है.
झारखंड में मॉब लिंचिंग की घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था का फेलियर नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता की भारी कमी को भी दर्शाती हैं. जब तक अफवाहों को रोकने के लिए तकनीकी और सामाजिक स्तर पर ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक बेगुनाह लोग “भीड़ के इंसाफ” की भेंट चढ़ते रहेंगे. सरकार को चाहिए कि वह लंबित पड़े विधेयक को जल्द से जल्द धरातल पर उतारे और संवेदनशील इलाकों में कम्युनिटी पुलिसिंग को बढ़ावा दे ताकि शक की बुनियाद पर किसी की जान न जाए.