42 साल का इंतजार, 116 गांवों का दर्द
सदन को संबोधित करते हुए सविता महतो ने कहा कि ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले चांडिल डैम के निर्माण से 84 मौजा के कुल 116 गांव विस्थापित हुए थे। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि चार दशक बीत जाने के बाद भी इन विस्थापितों को समुचित पुनर्वास की सुविधा नहीं मिल सकी है। हर साल मानसून के समय डैम के जल स्तर का सही प्रबंधन न होने के कारण इन गांवों में बाढ़ जैसी भयावह स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिससे विस्थापितों का जीवन नर्क बन जाता है।
विधायक की तीन प्रमुख मांगें
सविता महतो ने सरकार के समक्ष विस्थापितों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए तीन कड़े प्रस्ताव रखे विस्थापितों की बुनियादी सुविधाओं और संपूर्ण पुनर्वास की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए सरकार तुरंत 50 करोड़ रुपये की विशेष राशि आवंटित करे। उन्होंने मांग की कि डैम के आरएल मीटर की तकनीकी बाध्यता को समाप्त किया जाए और वर्षों से लंबित मुआवजे का भुगतान जल्द से जल्द विस्थापित परिवारों को किया जाए। भविष्य में बाढ़ की विभीषिका को रोकने के लिए डैम की जल भंडारण क्षमता को 180 आरएल मीटर से नीचे सीमित रखा जाए, ताकि आसपास के गांवों को डूबने से बचाया जा सके।
बाढ़ का दंश और प्रशासनिक उदासीनता
विधायक ने सदन के माध्यम से सरकार का ध्यान इस ओर भी खींचा कि डैम प्रबंधन और प्रशासन की लापरवाही का खामियाजा गरीब ग्रामीण भुगत रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक जल स्तर और मुआवजे की नीति में ठोस बदलाव नहीं होगा, तब तक विस्थापितों का संघर्ष समाप्त नहीं होगा।
विधायक सविता महतो की इस मांग का सदन में मौजूद अन्य सदस्यों ने भी समर्थन किया। अब देखना यह है कि क्या राज्य सरकार इस 42 साल पुराने जख्म पर मरहम लगाने के लिए कोई ठोस कदम उठाती है या विस्थापितों का इंतजार और लंबा होता है।