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  • 2026-02-25

Jamshedpur News: दलमा पत्थर नहीं हमारी पहचान, संस्कृति और अस्तित्व है के उद्घोष के साथ दलमा तराई क्षेत्र, ऐतिहासिक महा जन सम्मेलन का आयोजन

Jamshedpur: दलमा पत्थर नहीं हमारी पहचान, संस्कृति और अस्तित्व है, के उद्घोष के साथ दलमा तराई क्षेत्र में, माकुलाकोचा फुटबॉल मैदान (हिरण पार्क के समीप) में आज दलमा क्षेत्र ग्राम सभा सुरक्षा मंच (कोल्हान प्रमंडल) के तत्वावधान में एक ऐतिहासिक महा जन सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह स्थल दलमा की पहाड़ियों की गोद में स्थित है, जहां एक ओर घना वन क्षेत्र और दूसरी ओर तराई के गांवों की बसाहट है। प्राकृतिक वातावरण के बीच आयोजित इस सम्मेलन में दलमा तराई के विभिन्न गांवों से हजारों की संख्या में ग्राम सभा प्रतिनिधि, महिलाएं, युवा, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी एवं आमजन शामिल हुए।


यह सम्मेलन प्रस्तावित बंदरगाह परियोजना एवं क्षेत्र में चल रही उन योजनाओं के विरोध में आयोजित किया गया, जिनसे दलमा की प्राकृतिक संरचना, वन संपदा, वन्य जीव, जल स्रोत तथा स्थानीय समुदायों के संवैधानिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है।

मुख्य वक्ता के रूप में श्री सुरेश चंद्र सोय (मुख्य संयोजक, जिला स्तरीय ग्राम सभा मंच, सरायकेला-खरसावां), श्री माधव चंद्र कुंकल (जिला परिषद सदस्य सह झारखंड बचाओ जन संघर्ष मोर्चा), श्री रेयांस सायड (उपाध्यक्ष, ईचा खरकाई बांध विरोधी संघ, कोल्हान) एवं श्री दिनकर कच्छप (केंद्रीय अध्यक्ष, बिरसा सेना) ने सभा को संबोधित किया। सभी वक्ताओं ने कहा कि दलमा क्षेत्र की जनता विकास विरोधी नहीं है, परंतु वह ऐसे विकास मॉडल को स्वीकार नहीं करेगी जो गांवों को कमजोर करे और बाहरी कॉरपोरेट हितों को मजबूत बनाए।

वक्ताओं ने संविधान की पाँचवीं अनुसूची, अनुच्छेद 244(1), PESA Act 1996, वन अधिकार कानून 2006 एवं भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 का उल्लेख करते हुए कहा कि इन प्रावधानों के तहत जल–जंगल–जमीन पर ग्राम सभा का अधिकार सर्वोपरि है। बिना ग्राम सभा की पूर्व सहमति के किसी भी परियोजना की योजना बनाना या जमीन चिन्हित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है।

सभा में यह चिंता व्यक्त की गई कि विकास के नाम पर अरबों–खरबों रुपये की योजनाएं संचालित होती हैं, लेकिन उनका वास्तविक लाभ गांवों तक नहीं पहुंचता।

संसाधनों का बंटवारा तो होता है, परंतु स्थानीय लोगों की आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं में अपेक्षित सुधार नहीं दिखता। सम्मेलन में मांग की गई कि दलमा क्षेत्र के लिए गांव केंद्रित, ग्राम सभा आधारित और पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखने वाला समग्र विकास प्लान तैयार किया जाए।

सम्मेलन में राधाकृष्णन सिंह मुंडा, जगन्नाथ सिंह मुंडा, धनंजय शुक्ला, टोनी दिप्ती मेरी मिंज, राकेश रंजन माहतो (विस्थापित अधिकार मंच), रविन्द्र सिंह सरदार, डोमन बास्के, कर्मू चंद्र मार्डी, राधेश्याम सिंह सरदार, मेनका सिंह सरदार, सुखि टुडू, मामा जी गुरु चरण किस्कु, शक्तिपदो हांसदा, अनूप महातो, राजाराम मांझी, किंकर माहतो, गिडू मांझी, रविन्द्र सिंह, बाबूराम सोरेन, सत्यनारायण मुर्मू, भूषण पहाड़िया, बुधनी पहाड़िया, ईश्वर सबर, भक्तों रंजन भूमिज, अमर सिंह सरदार, सिताराम टुडू, प्रकाश मार्डी, रतन सिंह सरदार, चंदन सिंह सरदार, गुरु चरण कर्मकार, सुकलाल पहाड़िया सहित अनेक जनप्रतिनिधि एवं सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

सभा के अंत में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि दलमा क्षेत्र में किसी भी प्रकार का जबरन भूमि अधिग्रहण, प्रशासनिक दबाव या कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा देने वाली नीति का लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से विरोध किया जाएगा। साथ ही यह संकल्प लिया गया कि क्षेत्र की ग्राम सभाएं एकजुट होकर अपने अधिकारों की रक्षा करेंगी।

सम्मेलन ने स्पष्ट संदेश दिया कि दलमा की पहाड़ियां केवल पत्थरों का समूह नहीं, बल्कि क्षेत्र की सामूहिक अस्मिता और जीवंत धरोहर हैं। जल जंगल जमीन पर पहला और अंतिम अधिकार स्थानीय ग्राम सभाओं का है, और इस अधिकार से कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।
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