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  • 2026-02-28

Middle East Crisis: ईरान-इजरायल युद्ध से गहराया ऊर्जा संकट, 110 डॉलर तक जा सकता है कच्चा तेल, घरेलू बजट पर पड़ेगा असर

Middle East Crisis: शनिवार को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के प्रमुख शहरों पर किए गए भीषण हमलों ने वैश्विक तेल बाजार की नींव हिला दी है. ईरान ने इस कार्रवाई के जवाब में “फतह-ए-खैबर” नामक सैन्य अभियान शुरू किया है, जिसके तहत इजरायल और खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया जा रहा है. जानकारों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकती हैं. यह स्थिति न केवल भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए चिंताजनक है, बल्कि इससे आम आदमी की रसोई और परिवहन लागत में भी भारी बढ़ोतरी की आशंका है.

होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट से वैश्विक आपूर्ति ठप होने का डर
ईरान प्रति दिन लगभग 33 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन करता है, जो वैश्विक आपूर्ति का करीब 3 प्रतिशत है. हालांकि, बाजार की असली घबराहट ईरान के उत्पादन से ज्यादा “होर्मुज जलडमरूमध्य” (Strait of Hormuz) को लेकर है. दुनिया के कुल तेल व्यापार का 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है. प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल और रिफाइंड उत्पाद इसी मार्ग से विश्व बाजारों में पहुंचते हैं. यदि ईरान इस रास्ते को अवरुद्ध करता है, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में अभूतपूर्व व्यवधान आ सकता है, जिससे कीमतों में रातों-रात बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है.

“फियर प्रीमियम” के कारण कीमतों में 57 प्रतिशत तक उछाल के आसार
इक्विरस सिक्योरिटीज और राबोबैंक इंटरनेशनल के विशेषज्ञों के अनुसार, तेल बाजार वर्तमान में मांग-आपूर्ति के सामान्य नियमों के बजाय “युद्ध की दहशत” यानी “फियर प्रीमियम” से संचालित हो रहा है. यदि होर्मुज स्ट्रेट में आवाजाही बाधित होती है, तो कीमतों में 20 से 40 डॉलर प्रति बैरल का अतिरिक्त जोखिम शुल्क जुड़ सकता है. वर्तमान में ब्रेंट क्रूड 72.87 डॉलर के आसपास है, लेकिन तनाव बढ़ने की स्थिति में यह 110 डॉलर तक जा सकता है. यह मौजूदा कीमतों के मुकाबले लगभग 57 प्रतिशत की भयानक बढ़ोतरी होगी, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं होगी.

ईरान का भौगोलिक हथियार और सीमित पाइपलाइन विकल्प
फारस की खाड़ी के तेल उत्पादक देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनके पास निर्यात के लिए पाइपलाइन नेटवर्क की क्षमता बेहद सीमित है. राबोबैंक इंटरनेशनल की रिपोर्ट बताती है कि ये देश अपने तेल निर्यात के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते. ईरान का बंदर अब्बास बंदरगाह इस रास्ते के बिल्कुल समीप है, जहां से वह अपने छोटे और तेज रफ्तार हमलावर जहाजों तथा समुद्री माइंस के जरिए पूरे मार्ग को बाधित करने की क्षमता रखता है. यदि ईरान इस रणनीतिक हथियार का उपयोग करता है, तो खाड़ी देशों का तेल निर्यात पूरी तरह ठप हो सकता है.

भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर संभावित प्रभाव
भारत अपनी कच्चा तेल जरूरतों का करीब 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में थोड़ी सी भी वृद्धि भारत के राजकोषीय घाटे को बढ़ा देती है. यदि कच्चा तेल 110 डॉलर के पार जाता है, तो घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती हैं. इसका सीधा असर माल ढुलाई पर पड़ेगा, जिससे फल, सब्जी और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भी महंगाई की आग लग सकती है. केंद्र सरकार और तेल कंपनियां वर्तमान स्थिति पर पैनी नजर रख रही हैं ताकि संभावित झटके को कम करने के लिए कूटनीतिक और आर्थिक उपाय किए जा सकें.
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