National News: ईरान संकट के गहराने से होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होने का खतरा पैदा हो गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से यह स्पष्ट संकेत दिए गए हैं कि यह युद्ध लगभग एक महीने तक खिंच सकता है. इस स्थिति का सीधा अर्थ यह है कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की सप्लाई चेन में बड़ी रुकावट आ सकती है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की चिंता बढ़नी तय है. हालांकि, इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत के लिए राहत भरी खबर है. भारत के पास कच्चे तेल का इतना पर्याप्त भंडार मौजूद है कि करीब 45 दिनों तक देश की ऊर्जा जरूरतों पर कोई आंच नहीं आएगी.
केप्लर के आंकड़ों में भारत की मजबूत स्थिति
ऊर्जा बाजार विश्लेषण फर्म केप्लर के ताजा आकलन के मुताबिक, अगर होर्मुज स्ट्रेट का समुद्री रास्ता पूरी तरह बंद भी हो जाता है, तब भी भारत के पास 40 से 45 दिनों का सुरक्षित स्टॉक उपलब्ध है. आंकड़ों के अनुसार, भारत के पास वर्तमान में लगभग 10 करोड़ बैरल कमर्शियल कच्चे तेल का भंडार है. इस स्टॉक में देश की विभिन्न रिफाइनरीज के पास मौजूद तेल, भूमिगत रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) और समुद्र में भारत की ओर बढ़ रहे टैंकरों में लदा तेल शामिल है. यह बैकअप प्लान संकट के समय में भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है.
आयात निर्भरता और सप्लाई रूट की चुनौतियां
भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता है. इसमें से आधे से अधिक आपूर्ति पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) के देशों से होती है, जिसका बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट के संकरे मार्ग से गुजरता है. भारत प्रतिदिन औसतन 50 लाख बैरल तेल आयात करता है, जिसमें से लगभग 25 लाख बैरल इसी संवेदनशील रूट से आता है. केप्लर के मुख्य रिसर्च एनालिस्ट सुमित रितोलिया का मानना है कि यदि सप्लाई अस्थायी रूप से रुकती है, तो शुरुआत में कीमतों और वितरण व्यवस्था पर दबाव जरूर दिखेगा, लेकिन कमर्शियल स्टॉक और रास्ते में मौजूद जहाजों के कारण भारत को तत्काल किल्लत का सामना नहीं करना पड़ेगा.
ब्रेंट क्रूड में उछाल और बढ़ता आयात बिल
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं. यह ईरान संकट शुरू होने से पहले की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी है. कीमतों में यह उछाल भारत की जेब पर भारी पड़ सकता है. पिछले वित्त वर्ष में भारत ने तेल आयात पर 137 अरब डॉलर खर्च किए थे, जबकि चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जनवरी अवधि में ही 100.4 अरब डॉलर का भुगतान किया जा चुका है. जानकारों के अनुसार, तात्कालिक जोखिम तेल की भौतिक कमी से ज्यादा कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी और बढ़ते व्यापार घाटे का है.
रूस और अन्य देशों से भरपाई की रणनीति
अगर होर्मुज जलडमरूमध्य से आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो भारत के पास वैकल्पिक मार्ग और साझेदार मौजूद हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि भारत इस कमी को पूरा करने के लिए पश्चिम अफ्रीका, लातिनी अमेरिका, अमेरिका और रूस जैसे देशों से अतिरिक्त तेल की आपूर्ति ले सकता है. विशेष रूप से रूसी तेल भारत के लिए एक बड़े विकल्प के रूप में उभरा है. हालांकि, वैकल्पिक मार्गों से तेल मंगाने पर ढुलाई का खर्च बढ़ सकता है, लेकिन भारत की रणनीति स्पष्ट है कि वह किसी भी स्थिति में अपनी विकास की रफ्तार को धीमा नहीं होने देगा.