क्यों पड़ी इस योजना की जरूरत
सरकारी आंकड़ों 20वीं पशुगणना, 2019 ने चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अब मात्र 1.23 लाख गधे ही बचे हैं। साल 2012 के मुकाबले इनकी आबादी में लगभग 60% की भारी गिरावट आई है। मशीनीकरण के दौर में बोझा ढोने के लिए गधों का इस्तेमाल कम हो गया है, जिससे लोग इन्हें पालना छोड़ रहे हैं। इसी नस्ल को विलुप्त होने से बचाने के लिए सरकार ने इन्हें मिशन में शामिल किया है।
योजना की मुख्य बातें
किसे मिलेगी मदद, व्यक्तिगत उद्यमी, स्वयं सहायता समूह किसान उत्पादक संगठन और संयुक्त देयता समूह इस सब्सिडी का लाभ उठा सकते हैं। कितनी मिलेगी सब्सिडी, सरकार कुल प्रोजेक्ट लागत का 50% अधिकतम 50 लाख रुपये तक अनुदान के रूप में दे रही है।राज्यों को भी समर्थन, यदि कोई राज्य सरकार गधों की विशिष्ट नस्लों के संरक्षण के लिए ब्रीडिंग फार्म स्थापित करती है, तो केंद्र उन्हें भी अलग से वित्तीय सहायता प्रदान करेगा।
सिर्फ बोझा ढोना ही नहीं, कमाई के और भी जरिए
गधा पालन अब सिर्फ ईंट-भट्टों तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, गधी के दूध की मांग कॉस्मेटिक और दवाओं के बाजार में बहुत अधिक है, जो हजारों रुपये प्रति लीटर बिकता है। सरकार का उद्देश्य है कि इस योजना से पशुपालकों को आधुनिक तकनीक मिले और गधों की नस्ल भी सुरक्षित रहे।