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  • 2026-03-06

Jharkhand News: झारखंड में खनिज उत्पादन में तेजी, सोना और ग्रेफाइट की पैदावार बढ़ी

Jharkhand News: झारखंड में खनिज संसाधनों के उत्पादन में हाल के वर्षों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है. राज्य में सोने के उत्पादन में खासा इजाफा हुआ है, जिससे खनन क्षेत्र को सकारात्मक संकेत मिले हैं. आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021-22 में जहां राज्य में केवल 12 किलोग्राम सोना निकाला गया था, वहीं अब इसका उत्पादन बढ़कर 28 किलोग्राम से अधिक हो गया है.


कोयला उत्पादन और भंडार भी मजबूत

झारखंड को देश के प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों में माना जाता है और यहां कोयले के उत्पादन का कुल मूल्य लगभग 57,963 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. प्रति खदान औसतन करीब 1,525 करोड़ रुपये का उत्पादन दर्ज किया गया है. राज्य में फिलहाल लगभग 91,812 मिलियन टन कोयले का भंडार मौजूद है. इसमें झरिया क्षेत्र में करीब 19,830 मीट्रिक टन, उत्तरी कर्णपुरा में 21,194 मीट्रिक टन और राजमहल क्षेत्र में लगभग 20,837 मीट्रिक टन कोयले का भंडार शामिल है.

ग्रेफाइट उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी
झारखंड में ग्रेफाइट के उत्पादन में भी बड़ी छलांग देखने को मिली है. पहले जहां इसका उत्पादन करीब 54 टन था, वहीं अब यह बढ़कर 20,756 टन तक पहुंच गया है. इसके अलावा भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अध्ययन में राज्य के कई जिलों में दुर्लभ पृथ्वी तत्व, लिथियम और अन्य आधार धातुओं की मौजूदगी के संकेत मिले हैं. गिरिडीह जिले में लगभग 1.61 प्रतिशत लिथियम होने का अनुमान लगाया गया है.

जिला खनिज फाउंडेशन की स्थिति
जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) के तहत अब तक कुल 16,252 करोड़ रुपये जमा किए जा चुके हैं. इनमें से करीब 9,328 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, जो लगभग 69.3 प्रतिशत उपयोग दर को दर्शाता है. खर्च के मामले में धनबाद जिला सबसे आगे है, जहां 3,851 करोड़ रुपये उपयोग किए गए हैं, जबकि पश्चिम सिंहभूम में 3,574 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं.

ड्रोन से बीज बोने की नई तकनीक
पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से कोल्हान डिवीजन के जमशेदपुर और सरायकेला क्षेत्र में ड्रोन के माध्यम से हवाई बीज बोने की नई पहल शुरू की गई है. 6 से 10 किलोग्राम सामग्री ले जाने में सक्षम ड्रोन एक बार की उड़ान में करीब 1,000 बीज गेंदों को फैला सकते हैं. इस तकनीक के जरिए कोल्हान क्षेत्र में 60 से 80 प्रतिशत तक अंकुरण दर दर्ज की गई है. विशेषज्ञों के अनुसार यह तरीका पारंपरिक मैनुअल रोपण की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक प्रभावी साबित हो रहा है.

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