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  • 2026-03-21

India Energy Import: भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों के भरोसे, "तेल, गैस और एलपीजी पर कितनी है निर्भरता"

India Energy Import: भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन ऊर्जा के मामले में आज भी उसकी निर्भरता काफी हद तक विदेशों पर टिकी हुई है. पेट्रोल-डीजल बनाने के लिए कच्चा तेल हो, उद्योगों और शहरों के लिए प्राकृतिक गैस हो, या फिर घर-घर पहुंचने वाला एलपीजी सिलेंडर. इन तीनों मोर्चो पर भारत को बड़े पैमाने पर आयात का सहारा लेना पड़ता है. यही वजह है कि जैसे ही पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, होर्मुज जलडमरूमध्य का नाम चर्चा में आता है और भारत में पेट्रोल, गैस और सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ जाती है. सरकारी और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टो से साफ है कि 2024-25 में भी भारत की ऊर्जा सुरक्षा का सबसे कमजोर हिस्सा उसकी आयात निर्भरता ही रही. 
कच्चे तेल में सबसे ज्यादा विदेशी सहारा
भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल बाहर से खरीदता है. पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी PPAC के उपलब्ध सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में कच्चे तेल की खपत के मुकाबले आयात निर्भरता बहुत ऊंचे स्तर पर बनी हुई है. पिछले कुछ वर्षो से यह आंकड़ा 85 फीसदी के आसपास या उससे ऊपर रहा है, यानी देश में जितना तेल चाहिए, उसका बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है. यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होते ही भारत पर सीधा असर पड़ता है. कच्चे तेल की आपूर्ति में रूस, इराक, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों की भूमिका अहम रही है. हाल के महीनों में रूस भारत के लिए प्रमुख सप्लायर बना रहा, हालांकि पश्चिम एशिया के देशों की हिस्सेदारी भी अब भी काफी बड़ी है. 

भारत के लिए खतरा सिर्फ कीमत नही, रास्ता भी है
ऊर्जा संकट केवल इस बात पर निर्भर नही करता कि तेल किस देश से आता है, बल्कि इस पर भी निर्भर करता है कि वह भारत तक किस रास्ते से पहुंचता है. होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गो में गिना जाता है. पश्चिम एशिया से आने वाले तेल, एलपीजी और एलएनजी की बड़ी खेप इसी रास्ते से गुजरती है. ऐसे में अगर इस समुद्री रास्ते पर तनाव, रोक या सैन्य टकराव बढ़े, तो असर सीधे भारत की सप्लाई चेन पर पड़ सकता है. यही वजह है कि भारत में ऊर्जा सुरक्षा पर चर्चा होते ही केवल आयात मात्रा नहीं, बल्कि सप्लाई रूट भी बड़ी चिंता बन जाता है. 

प्राकृतिक गैस में भी आधी जरूरत बाहर से पूरी
कच्चे तेल की तरह प्राकृतिक गैस के मामले में भी भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर नही है. PPAC के प्राकृतिक गैस उपभोग आंकड़े दिखाते हैं that कुल खपत का एक बड़ा हिस्सा घरेलू उत्पादन से आता है, लेकिन एलएनजी आयात की हिस्सेदारी भी लगभग बराबरी के आसपास पहुंच जाती है. आसान भाषा में समझें तो देश में जितनी गैस खपत होती है, उसका करीब आधा हिस्सा बाहर से मंगानी पड़ती है. यह गैस बिजली, उर्वरक, उद्योग और सिटी गैस जैसे क्षेत्रों में बेहद जरूरी है. इसलिए गैस सप्लाई में थोड़ा भी झटका आने पर असर सिर्फ बड़े उद्योगों पर नहीं, बल्कि शहरों और रोजमर्रा की जरूरतों पर भी दिख सकता है. 

कतर पर खास निर्भरता, इसलिए गैस मोर्चे पर जोखिम ज्यादा
भारत के एलएनजी आयात में कतर की हिस्सेदारी काफी अहम है. हाल की अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह सामने आया है कि 2024-25 के दौरान भारत के कुल एलएनजी आयात में कतर का हिस्सा लगभग 41 फीसदी के आसपास रहा. इसका मतलब है कि अगर कतर से सप्लाई बाधित होती है, तो भारत पर तुरंत दबाव बढ़ सकता है. इसके अलावा यूएई, अमेरिका और ओमान जैसे देश भी सप्लाई करते हैं, लेकिन कतर अब भी सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है. इसलिए पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने का असर गैस सेक्टर पर भी गंभीर रूप से पड़ सकता है. 

एलपीजी में भी भारी आयात, घर की रसोई तक असर
रसोई गैस यानी एलपीजी के मामले में भी भारत को विदेशों पर भरोसा करना पड़ता है. सरकारी और बाजार से जुड़े उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि भारत अपनी एलपीजी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है. हाल के वर्षों में यह निर्भरता काफी बढ़ी है और कई रिपोर्टों में 60 फीसदी के आसपास का स्तर बताया गया है. बड़ी बात यह है कि भारत के एलपीजी आयात का बहुत बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है और उसका बड़ा भाग होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते पहुंचता है. इसलिए इस रूट में दिक्कत आते ही घरेलू सिलेंडर सप्लाई तक प्रभावित हो सकती है. 

यही वजह है कि गैस एजेंसियों पर लाइनें दिखने लगती है
जब अंतरराष्ट्रीय सप्लाई में दिक्कत आती है, तो उसका असर बहुत जल्दी जमीन पर दिखता है. हाल की रिपोर्टों में सामने आया कि होर्मुज रूट पर तनाव और शिपमेंट में देरी के बाद भारत में एलपीजी सप्लाई प्रभावित हुई. घरेलू जरूरत को प्राथमिकता देने की नौबत आई और कई जगहों पर उपलब्धता को लेकर दबाव बढ़ा. यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय संकट कभी-कभी सीधे मोहल्ले की गैस एजेंसी तक महसूस होने लगता है. आम आदमी को यह बात तब समझ आती है जब बुकिंग तो हो जाती है, लेकिन सिलेंडर समय पर नहीं पहुंचता. 

ऊर्जा सुरक्षा भारत के लिए अब सिर्फ आर्थिक नहीं, रणनीतिक मुद्दा
भारत दुनिया का बड़ा उपभोक्ता और बड़ा रिफाइनिंग देश जरूर है, लेकिन आयात निर्भरता उसे बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है. इसलिए सरकार के लिए ऊर्जा सुरक्षा अब केवल तेल खरीदने का मामला नहीं रहा. इसमें सप्लाई स्रोतों में विविधता, रणनीतिक भंडार, घरेलू उत्पादन बढ़ाना, गैस इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करना और नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर देना भी शामिल है. हाल में सरकार ने ऊर्जा डेटा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील विषय मानते हुए अधिक निगरानी की दिशा में कदम भी बढ़ाए हैं. यह बताता है कि ऊर्जा अब सिर्फ बाजार की चीज नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीति का केंद्र बन चुकी है. 

क्या समझें आम लोग
सीधी बात यह है कि भारत आज भी कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और एलपीजी के लिए विदेशों पर काफी निर्भर है. कच्चे तेल में निर्भरता सबसे ज्यादा है. गैस में लगभग आधी जरूरत आयात से पूरी होती है. एलपीजी में भी आयात का बड़ा हिस्सा है और उसका रास्ता भी संवेदनशील है. ऐसे में पश्चिम एशिया में जंग, समुद्री रास्ते पर तनाव या निर्यातक देशों में संकट का असर भारत पर पड़ना तय है. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय खबरों का संबंध केवल विदेश नीति से नहीं, बल्कि आपके पेट्रोल पंप, गैस सिलेंडर और रोजमर्रा के खर्च से भी है.
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