Jharkhand News: झारखंड उच्च न्यायालय ने दो दशक पुराने एक जघन्य हत्याकांड मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा दी गई मृत्युदंड की सजा को निरस्त कर दिया है. पलामू जिले के इस चर्चित मामले में अदालत ने "असंगत अतिशयोक्ति और विरोधाभासों" को आधार मानते हुए आरोपी संजय यादव और चमरू यादव को सभी आरोपों से मुक्त करने का आदेश दिया है. इस फैसले के बाद न्यायिक गलियारों में साक्ष्यों की विश्वसनीयता और पुलिस अनुसंधान की कमियों पर नई बहस छिड़ गई है.
एक ही परिवार के चार सदस्यों की हत्या
यह दर्दनाक मामला 3 दिसंबर 2004 का है जब पलामू जिले के पांकी थाना क्षेत्र में रोंगटे खड़े कर देने वाली वारदात हुई थी. एक ही परिवार के चार सदस्यों, जिनमें एक महिला और तीन मासूम बच्चे शामिल थे, की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. इस "नरसंहार" का आरोप संजय यादव और चमरू यादव पर लगा था. इस घटना ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया था और लंबे समय तक यह मामला सुर्खियों में बना रहा था.
निचली अदालत ने माना था "रेयरेस्ट ऑफ रेयर" केस
लगभग 16 वर्षों तक चले लंबे ट्रायल के बाद वर्ष 2020 में पलामू के जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत ने अपना फैसला सुनाया था. अदालत ने अपराध की प्रकृति को अत्यंत क्रूर और "दुर्लभ से दुर्लभतम" (Rare of Rare) मानते हुए दोनों आरोपियों को फांसी की सजा मुकर्रर की थी. इसके बाद नियमानुसार फांसी की सजा की पुष्टि के लिए मामला झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा, जहां खंडपीठ ने पूरे साक्ष्यों का दोबारा अवलोकन किया.
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: गवाहों के बयानों में भारी विसंगतियां
जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस दीपक रोशन की खंडपीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई की. अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए चश्मदीद गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास था. कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि "गवाहों द्वारा दिए गए विवरण में भारी अतिशयोक्ति थी," जिससे पूरी कहानी संदिग्ध प्रतीत होने लगी. अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि केवल मौखिक गवाही के आधार पर, जो खुद कानूनी मानकों पर खरी नहीं उतर रही, किसी को फांसी के फंदे तक नहीं भेजा जा सकता.
पुलिस जांच और वैज्ञानिक साक्ष्यों की कमी
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए. अदालत ने टिप्पणी की कि "पुलिस ने संभवतः घटना के शुरुआती और महत्वपूर्ण बिंदुओं को छिपाने का प्रयास किया था." वैज्ञानिक साक्ष्यों (Scientific Evidence) की अनुपलब्धता के कारण मामला पूरी तरह से गवाहों के बयानों पर टिका था, जो कि अदालत की नजर में अविश्वसनीय पाए गए. बचाव पक्ष के वरीय अधिवक्ता बीएम त्रिपाठी की दलीलों को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने माना कि घटना का समय और आरोपियों की पहचान संदेह के घेरे में है.
न्याय का सिद्धांत: भावनाओं पर भारी पड़े ठोस सबूत
राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने अपराध की क्रूरता का हवाला देते हुए सजा बरकरार रखने की पुरजोर वकालत की थी. हालांकि अदालत ने अपने अंतिम निष्कर्ष में कहा कि "न्याय का सिद्धांत भावनाओं या अपराध की गंभीरता पर नहीं, बल्कि ठोस और अकाट्य सबूतों पर आधारित होना चाहिए." संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों की रिहाई का मार्ग प्रशस्त कर दिया.