National News: भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें लंबे समय से स्थिर बनी हुई हैं, लेकिन पर्दे के पीछे सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) की वित्तीय स्थिति बिगड़ती जा रही है। मैक्वेरी ग्रुप (Macquarie Group) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने के बावजूद पंप की कीमतें नहीं बढ़ाने से कंपनियों को पेट्रोल पर 18 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर का भारी घाटा हो रहा है। तेल कंपनियों के लिए लाभ की स्थिति (ब्रेक-ईवन) तब होती है जब कच्चा तेल 80-85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हो, लेकिन हाल के वैश्विक तनावों के कारण यह 120 डॉलर तक पहुंच गया था।
चुनावों के बाद बड़े बदलाव के संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों के कारण कीमतों को स्थिर रखा गया है। मैक्वेरी ग्रुप की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इस महीने के अंत में मतदान प्रक्रिया पूरी होते ही ईंधन की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी का जोखिम है। कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से तेल कंपनियों के मार्केटिंग घाटे में लगभग 6 रुपये प्रति लीटर का इजाफा होता है। ऐसे में चुनावों के बाद कंपनियां घाटे की भरपाई के लिए कीमतों में संशोधन कर सकती हैं।
राजस्व का संकट और सरकारी कटौती
कंपनियों को होने वाले दैनिक नुकसान को कम करने के लिए सरकार ने हाल ही में पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10-10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की है। इस कदम से तेल कंपनियों का रोजाना का घाटा 2400 करोड़ रुपये से घटकर 1600 करोड़ रुपये पर आ गया है, लेकिन यह अब भी चिंताजनक स्तर पर है। भारत अपनी जरूरत का 88% कच्चा तेल रूस, अमेरिका और खाड़ी देशों से आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार और राजकोषीय घाटे पर गहरा असर पड़ रहा है। यदि एक्साइज ड्यूटी और कम की जाती है, तो सरकार को सालाना 36 अरब डॉलर के राजस्व का नुकसान हो सकता है।
आम आदमी पर महंगाई का चौतरफा असर
अगर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा होता है, तो इसका सीधा असर ट्रांसपोर्टेशन और लॉजिस्टिक्स की लागत पर पड़ेगा। डीजल महंगा होने से माल ढुलाई की दरें बढ़ेंगी, जिससे फल, सब्जी और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दामों में उछाल आना तय है। रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण साल 2026 की पहली तिमाही में करंट अकाउंट डेफिसिट 20 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। ऐसे में वैश्विक बाजार की अस्थिरता आने वाले समय में आम भारतीय उपभोक्ता की जेब पर बड़ा बोझ डाल सकती है।