Dhanbad News: नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही सिलेबस में लगातार हो रहे बदलाव का असर अब साफ दिखने लगा है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, धनबाद के झरिया इलाके में पुरानी किताबों का कारोबार लगभग ठप पड़ गया है. जहां एक ओर दुकानदार नुकसान झेल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अभिभावकों की चिंता बढ़ती जा रही है, क्योंकि हर साल नई किताबें खरीदना उनकी मजबूरी बन गया है.
हर साल बदलता सिलेबस, बेकार हो रहीं पुरानी किताबें और घटता कारोबार
झरिया में करीब 50 दुकानों पर पहले पुरानी किताबें आधे दाम में आसानी से मिल जाया करती थीं. एक ही सिलेबस कई वर्षों तक चलने के कारण बड़े बच्चों की किताबें छोटे बच्चों के काम आ जाती थीं. इससे न सिर्फ पढ़ाई आसान होती थी, बल्कि खर्च भी कम रहता था. लेकिन अब हर साल सिलेबस बदलने से यह व्यवस्था टूट गई है. दुकानदारों का कहना है कि पहले जो किताबें तुरंत बिक जाती थीं, अब वही दुकान में पड़ी रह जाती हैं. नई किताबों के लगातार बदलते संस्करणों ने पुराने स्टॉक को लगभग बेकार बना दिया है, जिससे छोटे कारोबारियों पर सीधा असर पड़ा है.
अभिभावकों की बढ़ी परेशानी, पूरा सेट खरीदने की मजबूरी
अभिभावकों का कहना है कि अब बच्चों की पढ़ाई पहले से कहीं ज्यादा महंगी हो गई है. पहले जरूरत के हिसाब से एक-दो किताबें खरीदी जा सकती थीं या पुरानी किताबों से काम चल जाता था. लेकिन अब स्कूलों की ओर से पूरा सेट खरीदने का दबाव बनाया जाता है. बाजार में अलग-अलग किताबें आसानी से मिलती भी नहीं हैं, जिससे अभिभावकों के पास पूरा सेट लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता. हर साल नई किताबें खरीदने की मजबूरी ने मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट बिगाड़ दिया है.
महंगी किताबों पर सवाल, स्कूल-पब्लिशर्स के गठजोड़ के आरोप
अभिभावक महासंघ के अध्यक्ष पप्पू सिंह ने इस स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि पब्लिक स्कूलों और पब्लिशर्स के बीच गठजोड़ की वजह से किताबें महंगी हो रही हैं. उनका कहना है कि जहां एनसीईआरटी की एक कक्षा की किताबें करीब 1000 रुपये में मिल जाती हैं, वहीं प्राइवेट स्कूलों की किताबों पर 8 से 10 हजार रुपये तक खर्च करना पड़ता है. इसे उन्होंने स्कूलों की मनमानी बताया और इस पर उच्च स्तर पर कार्रवाई की मांग की.
लगातार सिलेबस बदलने की नीति ने एक साथ दो मोर्चो पर असर डाला है, एक तरफ छोटे किताब विक्रेताओं का कारोबार कमजोर पड़ा है, तो दूसरी तरफ अभिभावकों की आर्थिक परेशानी बढ़ी है. नए सत्र के साथ यह मुद्दा फिर चर्चा में है और अब जरूरत है ऐसी व्यवस्था की, जिससे पढ़ाई का बोझ बच्चों के साथ-साथ परिवारों पर भी कम हो सके.