Jharkhand News: झारखंड में इंसान और हाथियों का संघर्ष अब बेकाबू हो चुका है. साल 2000 में राज्य गठन से लेकर अप्रैल 2026 तक हाथियों के हमले में 1550 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. अकेले पिछले चार साल में ही 400 मौतें दर्ज हुई हैं, जबकि 500 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल या दिव्यांग हुए हैं. कोडरमा और सरायकेला जैसे जिले अब इस खूनी संघर्ष के नए केंद्र बन गए हैं.
लगातार बढ़ती मौतों और जनाक्रोश को देखते हुए सरकार ने मुआवजे की राशि में भारी बढ़ोतरी की है. अब मृतक के परिजनों को 4 लाख के बजाय 10 लाख रुपए दिए जाएंगे, साथ ही 2000 रुपए की मासिक आर्थिक सहायता का भी प्रावधान किया गया है. पिछले दो दशकों में फसल, मकान और जान के नुकसान की भरपाई के एवज में सरकारी खजाने से 150 करोड़ रुपए से अधिक की राशि खर्च की जा चुकी है.
हाथी अब सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं हैं, वे बस्तियों और स्कूलों तक पहुंच रहे हैं. अब तक 15 हजार से अधिक मकान ध्वस्त हुए हैं और 50 हजार एकड़ से ज्यादा फसलें बर्बाद हो चुकी हैं. हाल ही में सरायकेला में एक हाथी ने स्कूल की दीवार तोड़कर 150 किलो मिड-डे मील का चावल चट कर दिया. रांची, खूंटी और चाईबासा जैसे जिलों में हाथियों का झुंड आए दिन रिहायशी इलाकों में तांडव मचा रहा है.
जानकारों का मानना है कि केवल मुआवजा बांटना समाधान नहीं है. हाथियों के प्राकृतिक रास्तों (कॉरिडोर) में इंसानी दखल और जंगलों की कटाई ने उन्हें आक्रामक बना दिया है. जब तक हाथियों के लिए जंगल के भीतर पर्याप्त भोजन और पानी का इंतजाम नहीं होगा, तब तक आबादी वाले इलाकों में यह मौत का खेल रुकने वाला नहीं है. वन विभाग की पुरानी निगरानी प्रणाली भी इस संकट को रोकने में नाकाम साबित हो रही है.