Hazaribagh: सरकारी विभागों में रोजगार के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से निजी एजेंसियों को जोड़ने की व्यवस्था पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। इन एजेंसियों के माध्यम से काम कर रहे कर्मियों का कहना है कि इस व्यवस्था का वास्तविक लाभ सरकार और एजेंसियों को मिल रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी खुद को उपेक्षित और परेशान महसूस कर रहे हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें समय पर वेतन तक नहीं मिल रहा है, जिससे उनके सामने रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना भी मुश्किल हो गया है और आर्थिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
वेतन भुगतान में देरी से बढ़ी परेशानी, कई महीनों से इंतजार
कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें तय मानकों के अनुसार न तो उचित वेतन मिल रहा है और न ही सरकारी योजनाओं से जुड़ी सुविधाएं मिल पा रही हैं। कई मामलों में स्थिति इतनी खराब हो गई है कि महीनों से वेतन लंबित पड़ा हुआ है। हजारीबाग मेडिकल कॉलेज अस्पताल में "राइडर" नामक एजेंसी के माध्यम से करीब 120 जीएनएम (नर्स), 15 वार्ड बॉय और कंप्यूटर ऑपरेटर काम कर रहे हैं। इनमें नर्सों को पिछले दो महीनों से वेतन नहीं मिला है, वहीं वार्ड बॉय चार महीनों से भुगतान का इंतजार कर रहे हैं, जबकि सुरक्षा गार्ड्स को तो आठ महीनों से वेतन नहीं मिला है। इस देरी ने कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया है।
जवाबदेही को लेकर उठे सवाल, जांच और हस्तक्षेप की मांग
नियमों के अनुसार, किसी भी सरकारी अनुबंध के तहत कार्य कर रही एजेंसी की यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपने कर्मचारियों को समय पर वेतन और सभी निर्धारित सुविधाएं उपलब्ध कराए। इसके बावजूद कर्मचारियों का आरोप है कि एजेंसी उनकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं दे रही है और लगातार टालमटोल किया जा रहा है। इस स्थिति से परेशान कर्मचारियों ने संबंधित अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग की है, ताकि उनका बकाया वेतन जल्द से जल्द मिल सके और एजेंसी की कार्यप्रणाली की निष्पक्ष जांच हो सके।