Ranchi: राजधानी के बहुचर्चित रिम्स जमीन घोटाला मामले में कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है। लगभग 7 एकड़ अधिग्रहित जमीन की अवैध खरीद-बिक्री की आरोपी सुमित्रा बड़ाइक ने गिरफ्तारी से बचने के लिए एसीबी (ACB) कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की है। सोमवार को इस मामले पर अदालत में सुनवाई हुई, जिसमें भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) और बचाव पक्ष ने अपना-अपना पक्ष रखा। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई के लिए 14 मई की तिथि निर्धारित की है।
फर्जी वंशावली का खेल, 31 लाख में बेच दी सरकारी जमीन
एसीबी की जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि भू-माफियाओं ने साल 1964-65 में रिम्स के लिए अधिग्रहित की गई सरकारी जमीन को फर्जी दस्तावेजों के सहारे निजी संपत्ति घोषित कर दिया था। जांच एजेंसी के अनुसार, आरोपियों ने एक फर्जी वंशावली तैयार की और उसके आधार पर करोड़ों की इस जमीन को बिल्डरों के हाथों महज 31 लाख रुपये में बेच डाला। इस पूरे खेल में न केवल भू-माफिया, बल्कि सरकारी तंत्र की संलिप्तता भी उजागर हुई है।
हाईकोर्ट की सख्ती, जांच के दायरे में 16 सरकारी अधिकारी
झारखंड हाई कोर्ट के कड़े रुख के बाद इस घोटाले की जांच ने रफ्तार पकड़ी है। एसीबी ने पिछले महीने ही इस मामले में चार प्रमुख आरोपियों कार्तिक बड़ाईक, राज किशोर बड़ाईक, चेतन कुमार और राजेश कुमार झा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। एजेंसी अब उन 16 सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच कर रही है, जिनकी मिलीभगत से जमीन के इन फर्जी दस्तावेजों को मान्यता मिली।
भू-माफियाओं और बिल्डरों के गठजोड़ पर वार
एसीबी का मानना है कि सुमित्रा बड़ाइक की अग्रिम जमानत याचिका पर होने वाली सुनवाई से इस मामले में कई और नए तथ्य सामने आ सकते हैं। फिलहाल, जांच टीम उन बिल्डरों और बिचौलियों की भी तलाश कर रही है जिन्होंने इस अवैध सौदे में निवेश किया था। राज्य सरकार और हाई कोर्ट की निगरानी में चल रही इस जांच ने जमीन के अवैध कारोबार से जुड़े सिंडिकेट में हड़कंप मचा दिया है।