Ghatsila News: पूर्वी सिंहभूम जिले के मुसाबनी क्षेत्र स्थित हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की राखा कॉपर माइंस से निकलने वाले दूषित पानी को लेकर आसपास के गांवों में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है. ग्रामीणों का आरोप है कि माइंस से निकलने वाला विषाक्त पानी सीधे नदी और नालों में छोड़ा जा रहा है, जिससे जल स्रोत प्रदूषित हो चुके हैं. लोगों का कहना है कि पानी अब पीने और उपयोग करने लायक नहीं बचा है. ग्रामीणों के अनुसार इस जहरीले पानी की वजह से इंसानों के साथ साथ जलीय जीव और पशु भी प्रभावित हो रहे हैं. मामले को लेकर रुवाम गांव के ग्राम प्रधान मनोरंजन महतो ने एचसीएल प्रबंधन को पत्र लिखकर कड़ी आपत्ति जताई है और प्रशासन से कार्रवाई की मांग की है.
दूषित पानी से नदी और नाले पूरी तरह जहरीले होने का आरोप
रुवाम गांव के ग्रामीणों का कहना है कि पहले जिस नदी और नाले के पानी का इस्तेमाल नहाने, पशुओं को पानी पिलाने और दूसरे घरेलू कामों में होता था, वही जल स्रोत अब जहरीले हो चुके हैं. ग्रामीण शिव शंकर सबर ने बताया कि दूषित पानी में नहाने के बाद उनके पूरे शरीर में खुजली और चर्म रोग की समस्या हो गई थी. करीब दो महीने तक इलाज कराने के बाद स्थिति में सुधार हुआ, लेकिन शरीर पर अब भी दाग मौजूद हैं. गांव के ही सूरज महतो का कहना है कि जहरीले पानी के संपर्क में आने के बाद उन्हें भी गंभीर चर्म रोग हो गया था. लंबे इलाज के बाद वह ठीक हुए और अब गांव के लोग इस पानी में नहाने से बच रहे हैं.
महिलाएं और बच्चे भी बीमारी की चपेट में
ग्रामीण महिला सुमित्रा सबर ने बताया कि पानी दूषित होने से पूरे गांव को परेशानी झेलनी पड़ रही है. लोगों के शरीर में खुजली और त्वचा संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं. उन्होंने कहा कि कई बार कंपनी प्रबंधन को इसकी शिकायत की गई, लेकिन अब तक कोई ठोस मदद नहीं मिली. ग्रामीणों का कहना है कि बच्चे भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं. गांव के अविनाश कुमार महतो को दूषित पानी में नहाने के बाद चर्म रोग हो गया, जिसके कारण वह करीब एक महीने तक स्कूल नहीं जा सके. इसी तरह अभिषेक कर्मकार और मनीषा महतो भी त्वचा रोग की चपेट में आ गए थे. इन बच्चों का इलाज घाटशिला अस्पताल में कराया गया.
जलीय जीव और पशु भी हो रहे प्रभावित
ग्राम प्रधान मनोरंजन महतो का कहना है कि माइंस से निकलने वाले पानी ने पूरे इलाके के प्राकृतिक जल स्रोतों को प्रभावित कर दिया है. पहले गांव के लोग और पशु इसी पानी का इस्तेमाल करते थे, लेकिन अब स्थिति ऐसी हो गई है कि जानवर भी इस पानी के पास जाने से बच रहे हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि जहरीले पानी की वजह से नदी और नालों में रहने वाले जलीय जीव भी खत्म हो रहे हैं. इससे पर्यावरण संतुलन पर भी असर पड़ रहा है.
ग्राम प्रधान ने एचसीएल पर लगाए पर्यावरण नियम तोड़ने के आरोप
ग्राम प्रधान मनोरंजन महतो ने एचसीएल कंपनी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कई बार लिखित और मौखिक रूप से कंपनी को चेतावनी दी गई, लेकिन इसके बावजूद माइंस का दूषित पानी प्राकृतिक जल स्रोतों में छोड़ा जा रहा है. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और जल सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है. उन्होंने मांग की है कि नदी और नालों में विषाक्त पानी छोड़ना तुरंत बंद किया जाए. साथ ही कंपनी अपने स्तर पर अलग जलाशय का निर्माण कर माइंस से निकलने वाले पानी को वहीं जमा करे ताकि प्राकृतिक जल स्रोत सुरक्षित रह सकें.
ठेका खनन और पेड़ कटाई को लेकर भी बढ़ा विरोध
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि एचसीएल कंपनी स्थानीय लोगों के हितों की अनदेखी कर रही है. गांव के लोगों का कहना है कि कंपनी खुद संचालन करने के बजाय ठेके के माध्यम से खनन करा रही है, जिससे निगरानी और जवाबदेही कमजोर हो रही है. ग्राम प्रधान ने यह भी आरोप लगाया कि इलाके में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जा रही है, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है. उनका कहना है कि किसी भी काम से पहले ग्राम सभा से अनुमति नहीं ली गई, जबकि नियमों के अनुसार ग्राम सभा की सहमति जरूरी है.
विवादित जमीन पर निर्माण को लेकर आंदोलन की चेतावनी
मनोरंजन महतो ने बताया कि जीयाडा द्वारा रुवाम मौजा में करीब 90 एकड़ जमीन एचसीएल कंपनी को दी गई है, लेकिन ग्रामीणों के अनुसार यह जमीन विवादित है. उन्होंने कहा कि जब तक ग्राम सभा स्तर पर विवाद का समाधान नहीं हो जाता, तब तक वहां किसी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं होना चाहिए. ग्राम प्रधान ने चेतावनी दी है कि अगर ग्रामीणों की मांगों को नजरअंदाज किया गया तो गांव के लोग उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगे. इस मामले को लेकर घाटशिला अनुमंडल पदाधिकारी, मुसाबनी अंचल अधिकारी और साउथ वेस्ट माइनिंग लिमिटेड को भी पत्र भेजकर कार्रवाई की मांग की गई है.
कंपनी प्रबंधन ने सभी आरोपों को बताया गलत
वहीं दूसरी ओर हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की राखा खदान का संचालन कर रही साउथ वेस्ट माइनिंग लिमिटेड के प्रोजेक्ट हेड मलय दरिपा ने ग्रामीणों के आरोपों को खारिज किया है. उनका कहना है कि खदान से निकलने वाले पानी को सीधे बाहर नहीं छोड़ा जाता. उन्होंने बताया कि पानी को चार अलग अलग चरणों वाली ट्रीटमेंट प्रक्रिया से गुजारा जाता है और निर्धारित मानकों का पालन करने के बाद ही उसे नाले के माध्यम से नदी में छोड़ा जाता है. उन्होंने कहा कि अब तक चर्म रोग की केवल एक शिकायत सामने आई है और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस पूरे मामले की जांच कर रहा है. प्रबंधन का दावा है कि खदान से पानी निकासी के लिए सेंट्रल ग्राउंड वाटर अथॉरिटी से विधिवत अनुमति ली गई है और पर्यावरण सुरक्षा के सभी नियमों का पालन किया जा रहा है.
ग्रामीणों और प्रबंधन के दावों के बीच जांच पर टिकी निगाहें
फिलहाल इस पूरे मामले में ग्रामीणों और कंपनी प्रबंधन के दावे एक दूसरे से बिल्कुल अलग नजर आ रहे हैं. एक तरफ ग्रामीण जहरीले पानी से स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कंपनी सभी प्रक्रियाओं को नियमों के मुताबिक बता रही है. अब लोगों की नजर प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच पर टिकी हुई है. क्योंकि अगर ग्रामीणों के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला सिर्फ पर्यावरण प्रदूषण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हजारों लोगों की सेहत और जल सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन सकता है.