SC On SIR: देशभर में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ कर दिया है कि मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण और सत्यापन की प्रक्रिया जारी रहेगी और इसे रोकने की कोई जरूरत नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 के तहत चुनाव आयोग को मतदाता सूची को अपडेट और शुद्ध करने का अधिकार प्राप्त है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक और वैध है.
महुआ मोइत्रा और योगेंद्र यादव समेत कई याचिकाओं पर हुई सुनवाई
यह फैसला उन कई याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आया जिनमें SIR प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी. इन याचिकाओं में टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, ADR, PUCL समेत कई संगठनों और नेताओं ने हिस्सा लिया था. सांसद मनोज झा, के सी वेणुगोपाल, सुप्रिया सुले और मुजाहिद आलम ने भी अदालत में याचिका दायर की थी.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि चुनाव आयोग ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं किया है और SIR प्रक्रिया कानून के मुताबिक संचालित की गई.
मतदाता सूची को पारदर्शी और सटीक बनाना है SIR का उद्देश्य
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि निष्पक्ष चुनाव के लिए समय-समय पर मतदाता सूची का पुनरीक्षण बेहद जरूरी है. अदालत के अनुसार इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य मृत, डुप्लीकेट और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाकर मतदाता सूची को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाना है.
कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को घर-घर जाकर सत्यापन करने और मतदाता सूची की सफाई करने का अधिकार है. इससे चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता मजबूत होती है.
SIR से नागरिकता तय नहीं होती, कोर्ट ने किया साफ
सुप्रीम Court ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया का संबंध केवल मतदान के अधिकार से है, नागरिकता तय करने से नहीं. अदालत ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति के दस्तावेजों को लेकर संदेह पैदा होता है तो चुनाव आयोग उसका नाम मतदाता सूची से हटाने की कार्रवाई कर सकता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं होगा कि वह व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है.
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति को उचित ट्रिब्यूनल के पास जाने का अधिकार रहेगा और अंतिम फैसला संबंधित प्राधिकरण ही करेगा. अदालत ने यह भी कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाने की कार्रवाई अंतिम नहीं मानी जा सकती.
आधार कार्ड को दस्तावेज के रूप में स्वीकार करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि आधार कार्ड को पहचान संबंधी दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जाए. शुरुआत में चुनाव आयोग द्वारा तय किए गए दस्तावेजों की सूची में आधार कार्ड शामिल नहीं था, जिस पर सवाल उठाए गए थे. बाद में अदालत ने अंतरिम आदेश देकर आधार को भी मान्य दस्तावेजों की सूची में शामिल करने का निर्देश दिया.
इसके अलावा कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके कारण भी सार्वजनिक किए जाएं ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे.
अपील प्रक्रिया आसान बनाने पर भी जोर
अदालत ने यह भी कहा कि अपील प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए ताकि किसी भी योग्य मतदाता को अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े. कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव आयोग के अधिकार असीमित नहीं हैं और पूरी प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय और पारदर्शिता के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए.
बिहार और पश्चिम बंगाल में SIR का बड़ा असर
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि बिहार और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में SIR प्रक्रिया के आधार पर मतदाता सूची में बड़े बदलाव किए गए थे. बिहार में जून 2025 में शुरू हुई इस प्रक्रिया के दौरान मृत मतदाताओं समेत 60 लाख से अधिक नाम हटाए गए थे. वहीं पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले करीब 90 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए जाने को लेकर राजनीतिक विवाद भी खड़ा हुआ था.
SIR के तहत उन लोगों से दस्तावेज मांगे गए थे जिनके नाम 2002 या 2003 की मतदाता सूची में शामिल नहीं थे. उन्हें पुराने मतदाताओं से अपना संबंध साबित करने के लिए दस्तावेज देने को कहा गया था. इसी को लेकर कई संगठनों और नेताओं ने अदालत में चुनौती दी थी.
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद साफ हो गया है कि SIR प्रक्रिया देशभर में जारी रहेगी और चुनाव आयोग को मतदाता सूची के पुनरीक्षण का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है.