Jharkhand Delimitation Protest: झारखंड में परिसीमन को लेकर आदिवासी संगठनों ने राज्यव्यापी आंदोलन की घोषणा की है. संगठनों ने स्पष्ट किया है कि वे परिसीमन प्रक्रिया के विरोध में नहीं हैं, लेकिन अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या में किसी भी प्रकार की कटौती स्वीकार नहीं की जाएगी.
रांची प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि आरक्षित सीटों में कमी की आशंका को लेकर 30 अगस्त को मोरहाबादी मैदान में राज्यस्तरीय आदिवासी एकता महाजुटान आयोजित किया जाएगा. इसमें राज्य के सभी 24 जिलों से आदिवासी समाज के लोगों के शामिल होने की बात कही गई है.
जिलों में जनजागरण रथ, बनेगी समन्वय समिति
महाजुटान से पहले सभी जिलों में जनजागरण रथ निकाले जाएंगे. इसके साथ ही आंदोलन को संगठित रूप देने के लिए जिला स्तर पर समन्वय समितियों का गठन किया जाएगा. संगठनों का कहना है कि अभियान के जरिए लोगों को परिसीमन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े संभावित प्रभावों की जानकारी दी जाएगी.
जनसंख्या आधारित प्रक्रिया से सीटें घटने की आशंका
सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मी नारायण मुंडा ने कहा कि परिसीमन सीधे राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा विषय है. उनका कहना था कि यदि केवल जनसंख्या के आधार पर परिसीमन किया गया तो अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या घट सकती है. उन्होंने कहा कि संगठनों का विरोध परिसीमन से नहीं, बल्कि आरक्षित सीटों में कटौती से है.
उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 75 वर्षों में आदिवासियों की सुरक्षा और संरक्षण से जुड़े कई संवैधानिक प्रावधानों को पूरी तरह लागू नहीं किया गया. विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापन और पलायन बढ़ा, जिससे आदिवासी आबादी के अनुपात पर असर पड़ा.
“पहले उपेक्षा की भरपाई हो, फिर परिसीमन”
केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष अजय तिर्की ने कहा कि संगठन परिसीमन का स्वागत करते हैं, लेकिन आरक्षित सीटों में कमी किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं होगी. उन्होंने कहा कि पहले आदिवासी समाज के साथ हुई उपेक्षा और नुकसान की भरपाई की जाए, उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया पर आगे बढ़ा जाए.
पूर्व मेयर रमा खलखो ने कहा कि आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों और उनकी वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखते हुए आरक्षित सीटों में कटौती नहीं होनी चाहिए.
अनुसूचित क्षेत्रों की संवैधानिक सुरक्षा की मांग
सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने कहा कि अनुसूचित क्षेत्र केवल जनसंख्या के आधार पर तय नहीं हुए हैं. ये क्षेत्र आदिवासी समाज के लंबे संघर्ष और बलिदान का परिणाम हैं. उन्होंने मांग की कि परिसीमन की प्रक्रिया में अनुसूचित क्षेत्रों और आदिवासी हितों की संवैधानिक सुरक्षा हर हाल में सुनिश्चित की जाए.